
Indresh Ji Maharaj : इंद्रेश जी महाराज ने क्यों लिया किरण बजाज का नाम, भावुक कर देने वाली कथा
Indresh Ji Maharaj : भागवत कथा के मंच से अक्सर आध्यात्मिक ज्ञान की बातें होती हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसे क्षण भी आते हैं, जब कथा केवल उपदेश नहीं रहती, बल्कि जीवन की सबसे कोमल भावनाओं को छू जाती है। ऐसा ही एक भावुक पल तब देखने को मिला, जब इंद्रेश जी महाराज ने मंच से किरण बजाज जी का नाम लेते हुए उन्हें “मासी जैसी माँ” कहा।
इंद्रेश जी महाराज ने स्वयं कहा कि वे सामान्यतः किसी श्रोता को नाम लेकर संबोधित नहीं करते, लेकिन इस दिन किरण बजाज जी का उल्लेख करना उनके लिए आवश्यक था। कारण न तो उनका उद्योगपति होना था और न ही उनका सामाजिक कद, बल्कि वह उपकार और श्रद्धा, जो वर्षों पहले एक सच्चे भक्त ने उनके परिवार के लिए की थी।
महाराज ने कथा के दौरान अपने जीवन का एक निजी प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में तीन बहनें थीं। पुराने समय में समाज में यह सोच आम थी कि परिवार में एक पुत्र अवश्य होना चाहिए, ताकि वंश और सेवा परंपरा आगे बढ़ सके। उनके परिवार में भी यही भाव था—एक ‘लाला’ हो जाए, ताकि ठाकुर जी की सेवा और भागवत परंपरा निरंतर चलती रहे।
उनके पूज्य पिताजी महाराज ने वर्धा, सिकवावाद और मुंबई जैसे कई स्थानों पर कथाएं सुनाईं। उनके मन में यह गहरी इच्छा थी कि ईश्वर उन्हें एक पुत्र प्रदान करें, जो आगे चलकर भागवत सेवा को आगे बढ़ाए।
इसी बीच, किरण बजाज जी ने वह किया, जो सच्ची भक्ति का उदाहरण बन गया। इंद्रेश जी महाराज ने बताया कि उनके जन्म से पहले किरण बजाज जी तिरुपति बालाजी तक पैदल गई थीं। वहां उन्होंने श्री वेंकटेश भगवान से कोई सांसारिक संपत्ति नहीं मांगी, बल्कि एक ही प्रार्थना की
हमारे ठाकुर जी को, हमारे गुरुदेव को, उनकी सेवा के लिए एक पुत्र दीजिए।
यह प्रार्थना केवल एक परिवार के लिए नहीं थी, बल्कि सेवा, परंपरा और भक्ति के लिए थी। महाराज ने कहा कि कहीं न कहीं उसी भाव और तपस्या का फल है कि आज वे स्वयं भागवत कथा के मंच पर बैठे हैं और श्रोता कथा का रस ले रहे हैं।
जब किरण बजाज जी कथा स्थल पर पहुंचीं, तो यह प्रसंग महाराज के मन में फिर से जीवित हो उठा। उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि वे उन्हें बचपन से “मौसी” नहीं, बल्कि “मासी” कहते आए हैं—अर्थात् माँ जैसी।
महाराज ने कहा,
“माता-पिता और संतों का आशीर्वाद तो मिलता ही है, लेकिन कई बार वैष्णव भक्तों का आशीर्वाद भी जीवन की दिशा तय करता है। किरण बजाज जी उन वैष्णवों में से एक हैं।”
यह कथा केवल एक व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि उस वैष्णव परंपरा की है, जिसमें सेवा और कृतज्ञता को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। यहां भक्ति का अर्थ दिखावा नहीं, बल्कि त्याग, प्रार्थना और निःस्वार्थ भाव है।
आज के समय में, जब सफलता को केवल धन और पद से मापा जाता है, यह प्रसंग याद दिलाता है कि सच्ची सफलता वह है, जो किसी की सेवा और आशीर्वाद से प्राप्त हो।
भागवत कथा का यह क्षण श्रोताओं के लिए भी उतना ही भावुक था, जितना महाराज के लिए। यह कहानी बताती है कि कभी-कभी मंच से बोले गए कुछ शब्द, वर्षों की साधना और प्रेम को व्यक्त कर देते हैं।
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Updated on:
18 Jan 2026 12:15 pm
Published on:
18 Jan 2026 12:15 pm
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