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आगरा। भगवान श्रीकृष्ण को विष्णुजी के आठवें अवतार के रूप में भी माना जाता है। ये विष्णुजी का सोलह कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार था। भगवान श्री राम तो विष्णु के अवतार के रूप में एक राजकुमार के रूप में अवतरित हुए थे, जबकि भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य क्रूर राजा कंस की कारागार में हुआ था।
इन नक्षत्रों में हुआ था जन्म
वैदिक सूत्रम के चेयरमैन और भविष्यवक्ता पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। भगवान श्रीराम का विष्णुजी का अवतार 27 नक्षत्रों के राजा पुष्य नक्षत्र में हुआ था जो कि महाशक्तिशाली आध्यातिमक दैवीय शकितयों से युक्त नक्षत्र है, जो कि वैदिक हिन्दू ज्योतिष में कर्क राशि के अधीन आता है। जिसका स्वामी चन्द्रमा ग्रह है और पुष्य नक्षत्र का स्वामी शनि ग्रह हैं इसी कारण भगवान श्री राम अपने विष्णु अवतार अवधि काल में मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से जाने गए। क्योंकि पुष्य नक्षत्र के स्वामी शनि ग्रह को वैदिक हिन्दू ज्योतिष में न्यायाधीश व महान त्यागी एवं अपनी समय अवधि आने पर गलत कर्मों का क्रूरतम दंड देने वाला भी कहा जाता है निष्पक्षता के साथ।
शुभ दर्जा प्राप्त रोहिणी नक्षत्र
दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म पुष्य नक्षत्र के बाद दूसरा सबसे अधिक शुभ दर्जा प्राप्त रोहिणी नक्षत्र में हुआ था जो कि वृषभ राशि के अधीन आता है। जिसका कि स्वामी ग्रह शुक्र है जिसको कि ग्रहों में दैत्यों के गुरु अर्थात मंत्री पद का दर्जा प्राप्त है। इसके साथ ही रोहिणी नक्षत्र का स्वामी भी चन्द्र ग्रह है जिसमे चन्द्रमा की स्थिति अर्थात व्यक्ति के मन की स्थिति जन्मकुंण्डली में उच्च अवस्था में होती है। 27 नक्षत्रों के राजा पुष्य नक्षत्र की तरह। इस प्रकार पुष्य नक्षत्र और रोहिणी नक्षत्र एक दूसरे के पूरक हैं दोनों ही अति शुभ और शक्तिशाली नक्षत्र हैं क्योंकि दोनों ही नक्षत्रों में व्यक्ति की मन की स्थिति बहुत शक्तिशाली होती है और दैवीय शक्ति का आशीर्वाद के लिए होती है और एक आदर्श प्रेम और सन्देश को प्रसारित करती है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था जो कि वृषभ राशि के अधीन है और इस राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं से युक्त भव्यतम अवतार हुआ। श्री राधाजी के साथ आदर्श एवं अमर आध्यातिमक प्रेम का संचार हुआ जो इस सम्पूर्ण विश्व में युगों युगों तक याद किया जायेगा।
14 अगस्त को मनाया जाएगा
वैदिक सूत्रम के चेयरमैन भविष्यवक्ता पंडित प्रमोद गौतम ने अधिक जानकारी देते हुए कहा कि इस बार 14 अगस्त 2017 को भगवान श्रीकृष्ण का 5244 वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा। क्योंकि इस बार अष्टमी तिथि 14 अगस्त 2017 को रात्रि 7 बजकर 45 से आरम्भ हो जाएगी, जो कि 15 अगस्त 2017 को सायं 5 बजकर 39 मिनट तक रहेगी। इस बार अष्टमी तिथि मध्य रात्रि में निशिता काल में 14 और 15 अगस्त की मध्य रात्रि में आएगी इसलिये श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत सम्पूर्ण विश्व और बृजभूमि में 14 अगस्त को रखा जाएगा। निशिता पूजा का समय 14 और 15 अगस्त की मध्य रात्रि 12 बजकर 20 मिनट से मध्य रात्रि 1 बजकर 05 मिनट तक है अर्थात निशित काल की अवधि 45 मिनट तक है और मध्यरात्रि का क्षण 12 बजकर 45 मिनट तक रहेगा।
बिना रोहिणी नक्षत्र के
15 अगस्त को, पारण का समय सायं 5 बजकर 39 मिनट के बाद पारण के दिन अष्टमी तिथि का समाप्ति समय 15 अगस्त को सायं 5 बजकर 39 मिनट तक है। इसलिए इस बार की जन्माष्टमी पर्व रोहिणी नक्षत्र के बिना रहेगी। क्योंकि इस बार 14 और 15 अगस्त की मध्य रात्रि को जन्माष्टमी के दिन भरणी नक्षत्र रात्रि 3 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। इसलिये वैष्णव श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत पर्व 15 अगस्त 2017 को है। क्योंकि वैष्णव सूर्योदय में उदय होने वाली अष्टमी तिथि को मानते हैं इसलिए अगले दिन का पारण समय सुबह 6 बजकर 23 मिनट(सूर्योदय के बाद) पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी है। इसलिए इस बार का श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व रोहिणी नक्षत्र के बिना रहेगा।
Published on:
11 Aug 2017 01:37 pm
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