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हे कृष्ण! क्या आपकी मौजूदगी में छल से मारे गए थे ये शूरवीर

पुराणों में कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए इन शूरवीरों को बलि के बेदी पर चढ़ने दिया

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Hariom Dwivedi

Jan 03, 2016

भगवान श्रीकृष्ण
हरिओम द्विवेदी
लखनऊ.भगवान श्रीकृष्ण को कई नामों से जाना जाता है। उन्होंने भक्तों की रक्षा के लिए कई दुष्टों का भी संहार किया है। अब तक के सबसे बड़े युद्ध यानी महाभारत में वो कुंती पुत्र अर्जुन के सारथी बने थे। श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन को वचन दिया था कि वे महाभारत के युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएंगे, न ही किसी का वध करेंगे। लेकिन फिर भी महाभारत के युद्ध में उन पर 6 शूरवीरों की हत्याओं का आरोप है, जिनमें एक महाबली भीमपुत्र घटोत्कच भी शामिल है। आइए जानते हैं नटवरलाल श्रीकृष्ण पर किनकी हत्या करने का आरोप है-
भीष्म पितामह
श्रीकृष्ण पर आरोप है कि उन्होंने सबसे वीर व कौरवों के प्रधान सेनापति भीष्म की हत्या करवाई। पुराणों के मुताबिक, महाभारत का युद्ध चल रहा था। भीष्म पितामह कौरव सेनापति थे। उनके सामने पांडव सेना का कोई भी वीर टिक नहीं पा रहा था। चाहे वो अर्जुन हों या कोई अन्य। ऐसे में श्रीकृष्ण ने शिखंडी को आगे किया, जो पूर्वजन्म में अम्बा नाम की राजकुमारी थी, जिसने भीष्म से बदला लेने के लिए पुरुष के रूप में जन्म लिया था। इसे भीष्म पितामह भी जानते थे। इसलिए उन्होंने जैसे ही शिखंडी को देखा धनुष डाल दिया। कहा कि वह औरत पर शस्त्र नहीं चलाएंगे। भीष्म को अस्त्र डालते देख अर्जुन भी उनसे युद्ध नहीं करना चाहते थे।
श्रीकृष्ण ने समझाया और कि हे अर्जुन तुम जिन्हें अपना समझ रहे हो वे तो पहले ही मर चुके हैं। हर किसी की जन्म और मृत्यु मेरे हाथ में ही है। तुम व्यर्थ चिंता करते हो। श्रीकृष्ण ने कहा अर्जुन तुम शिखंडी की ओट में भीष्म पर बाण चलाओ, तभी महाभारत में पांडवों की विजय होगी। तब अर्जुन ने भीष्म पितामह पर बाणों की झड़ी लगाते हुए उन्हें युद्धभूमि में गिरा दिया। हालांकि, पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान था इसलिए वह महाभारत के अंत तक वह शैय्या पर ही लेटे रहे।
द्रोणाचार्य
भीष्म पितामह की मौत के बाद दुर्योधन ने कुलगुरु द्रोणाचार्य को कौरव सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त किया। जिन्हें हराना पांडवों के बस की बात नहीं थी। महाभारत के अनुसार, तब भी श्रीकृष्ण ने छल से द्रोणाचार्य का वध कराया। वह अर्जुन को द्रोणाचार्य के बजाय दूसरे से युद्ध में लगा दिया। श्रीकृष्ण के इशारे पर भीम ने अश्वसथामा नाम के एक हाथी को मार दिया और सभी गुरु द्रोणाचार्य के सामने जाकर कहने लगे कि अश्वसथामा मारा गया। बता दें कि अश्वसथामा द्रोणाचार्य का इकलौता बेटा था।
पांडव सेना के इस हो-हल्ला पर द्रोणाचार्य को भरोसा नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर (जो कभी झूठ नहीं बोलते थे) में पूछा कि क्या यह सच है। युधिष्ठिर ने कहा अश्वस्थामा मारा गया, लेकिन वह हाथी था (अश्वसथामा मरो व नरो कुंजरो)। द्रोणाचार्य युधिष्ठिर का अंतिम वाक्य नहीं सुन पाए। क्योंकि तभी श्रीकृष्ण आदि ने शंख बजाने शुरू कर दिए। पुत्र मृत्यु का समाचार मिलते ही द्रोणाचार्य रणभूमि में ही योग की मुद्रा में बैठ गए। इस दौरान द्रुपद पुत्र धृष्टदुम्न पूर्व में हुए पिता के अपमान के बदले की तलाश में था। उसने मौका देखते ही गुरु द्रोणाचार्य का सिर तलवार से काट दिया। गुरु की मौत का बदला लेने के लिए अर्जुन ने धृष्टदुम्न को मारने के लिए तलवार उठाई, तब श्रीकृष्ण ने ही उन्हें समझा-बुझाकर शांत किया।
जयद्रथ
महाभारत के युद्ध में चक्रव्यूह में फंसे अर्जुन पुत्र अभिमन्यु को कई योद्धाओं ने घेरकर मार डाला। कौरवों ने चक्रव्यूह की रचना की थी और जिसे तोड़ना सिर्फ अर्जुन को ही आता है। इस दौरान जयद्रथ अर्जुन को युद्ध में ललकारते हुए रणभूमि से दूर ले गया था, जिसके चलते अभिमन्यु को योद्धाओं ने घेरकर वध कर दिया था। अर्जुन ने पुत्र की हत्या के लिए मुख्य रूप से जयद्रथ को ही जिम्मेदार माना। उन्होंने प्रण लिया कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले ही जयद्रथ का वध कर दूंगा, नहीं तो आत्महत्या कर लूंगा।
युद्ध के अगले दिन कौरवों ने अर्जुन के सामने शूरवीर योद्धाओं की फौज खड़ी कर दी और जयद्रथ को सबसे लास्ट में सुरक्षित रखा। पूरे दिन युद्ध करने के बावजूद अर्जुन जयद्रथ तक नहीं पहुंच पाए। श्रीकृष्ण ने देखा कि अर्जुन आज सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को नहीं मार पाएंगे तो उन्होंने अपने चक्र से सूर्य को ढक लिया। अर्जुन ने समझा सूर्यास्त हो गया है। वह अग्नि की बेदी बनाकर प्राणाहुति की तैयारी करने लगे थे। अर्जुन को धनुष रखता देख श्रीकृष्ण ने कहा हे अर्जुन तुम वीर हो गांडीव धनुष और तरकश लेकर अग्नि में प्रवेश करो। सूर्यास्त समझ जयद्रथ भी वहां आ गया और अट्टहास करने लगा। मौका देखते ही श्रीकृष्ण ने चक्र को इशारे से हटा लिया। बादलों की ओट से सूर्य निकल आया। जब तक कोई कुछ समझे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इशारा किया कहा- अर्जुन वो रहा सूर्य और ये रहा जयद्रथ। अर्जुन ने तुंरंत ही गांडीव पर बाण चढ़ाकर जयद्रथ की सिर काट लिया।
कर्ण
महाबली कर्ण को दानवीर कर्ण के नाम से भी जाना जाता है। कर्ण के पास सूर्य भगवान के दिए हुए कवच-कुंडल थे। जिन्हें कोई भी अस्त्र-शस्त्र भेद नहीं सकता था। देवराज इंद्र ने अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए सूर्य पुत्र कर्ण से कवच-कुंडल मांग लिए थे, बदले में कर्ण को पांच ऐसे तीर दिए जो किसी की भी हत्या करने में सक्षम थे। यह सबकुछ श्रीकृष्ण जानते थे। उन्होंने अपनी बुआ कुंती को कर्ण (कर्ण की माता भी थीं कुंती) के पास भेजा कि जाओ दानवीर कर्ण से पांच तीर मांग लाओ।
श्रीकृष्ण के कहने पर ही कुंती ने पांडवों की रक्षा के लिए कर्ण से पांचों तीर मांग लिए। इतना ही नहीं कर्ण ने अपनी मां को वचन दिया कि आपके पांच पुत्र हमेशा ही बने रहेंगे। बस या तो अर्जुन मरेगा या फिर मैं। अगर कर्ण के पास वे तीर होते तो कर्ण को महाभारत के युद्ध में मारा नहीं जा सकता था।
घटोत्कच
हिडिंबा और भीम के पुत्र विशालकाय घटोत्कच ने महाभारत के युद्ध में पांडवों की तरफ से युद्ध करते हुए कौरवों की सेना में उथल-पुथल मचा दी। यह देख दुर्योधन ने कर्ण से कहा कि हे मित्र कर्ण! जाओ इस महाबली असुर का संहार कर दो। लेकिन कर्ण के पास सिर्फ एक दिव्यास्त्र था, जिसको उसने कुंती पुत्र अर्जुन को मारने के लिए रखा था और प्रण लिया था कि वह आज इसी तीर से अर्जुन का वध करेगा। श्रीकृष्ण ने उसी दिन घटोत्कच को युद्ध के लिए बुला लिया था।
कौरव सेना के बार-बार कहने बार कर्ण ने वह दिव्यास्त्र घटोत्कच पर छोड़ दिया, जिससे वह मारा गया। इस प्रकार श्रीकृष्ण घटोत्कच की हत्या का भी कारण बने।
दुर्योधन
महाभारत भारत के अंतिम युद्ध के तौर पर जब भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध चल रहा था। दुर्योधन भीम पर भारी पड़ रहा था। क्योंकि उसका पूरा शरीर वज्र का था, सिर्फ जंघा ही वज्र की नहीं थीं। महाभारत के युद्ध में गदा युद्ध का एक नियम था कि कोई गदाधारी दूसरे पर कमर के नीचे प्रहार नहीं करेगा। इस तरह से दुर्योधन अजेय हो गया था। श्रीकृष्ण के ही कहने पर भीम ने दुर्योधन की जंघाओं पर वार किया, जिसके बाद उसकी हत्या की जा सकी।

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श्रीकृष्ण ने ही वज्र नहीं होने दिया था पूरा शरीर
पुराणों में कहा गया है कि जब महाभारत के युद्ध की आशंकाएं बढ़ती जा रही थीं, गांधारी ने अपने पुत्र दुर्योधन से कहा कि तुम स्नान कर एकदम निर्वस्त्र होकर मेरे सामने आओ। मैं अपनी दिव्य शक्ति से तुम्हारे पूरे शरीर को वज्र का बना दूंगी। दुर्योधन आ भी रहा था, लेकिन रास्ते में श्रीकृष्ण मिल गए। उन्होंने दुर्योधन से अब बड़े हो गए हो, मां के सामने निर्वस्त्र जाने में शर्म नहीं आती है क्या? कम से से कम अंडरवियर तो पहन लो। उनके कहने पर ही दुर्योधन ने अंडरवियर पहनी थी, जिसके चलते उसका पूरा शरीर वज्र का नहीं हो पाया था और आखिर में वही उसकी मौत का कारण बना।