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Pradosh Vrat: स्कंद पुराण की इस कथा के बगैर प्रदोष व्रत अधूरा, सुनने से सौ जन्म तक नहीं मिलते कष्ट

Pradosh Vrat हर व्रत के पीछे कोई न कोई कथा जरूर है। यह कथा उस व्रत का महत्व बताती है। 11 अक्टूबर बुधवार को प्रदोष व्रत है, इसलिए जानते हैं बुध प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा के बारे में..

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Pravin Pandey

Oct 10, 2023

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बुध प्रदोष व्रत कथा

प्रदोष व्रत कथा
स्कंद पुराण की कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने बेटे के साथ भिक्षा मांग कर गुजारा करती थी और शाम के समय तक घर लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसने नदी किनारे सुन्दर बालक देखा। इस बालक का नाम धर्मगुप्त था और वह विदर्भ देश का राजकुमार था। उस बालक के पिता युद्ध में दुश्मनों के हाथों वीर गति को प्राप्त हुए थे और राज्य को अपने अधीन कर लिया थी। इधर, पिता के शोक में धर्मगुप्त की माता भी चल बसी थी और शत्रुओं ने धर्मगुप्त को राज्य से बाहर कर दिया थी। बालक की हालत देख ब्राह्मणी ने उसे अपना लिया और अपने पुत्र के समान ही उसका भी पालन-पोषण करने लगी।

कुछ दिनों बाद ब्राह्मणी अपने दोनों बालकों को लेकर दैवयोग से मंदिर गई, यहां उसकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को उस बालक के अतीत के बारे में बताया, जिसे सुन ब्राह्मणी बहुत उदास हुई। ऋषि ने ब्राह्मणी और उसके दोनों बेटों को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी और उससे जुड़े पूरे वधि-विधान के बारे में बताया। ऋषि के बताए नियमों के अनुसार ब्राह्मणी और बालकों ने व्रत सम्पन्न किया लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि इस व्रत का फल क्या मिल सकता है।

व्रत के प्रभाव से राजकुमार का विवाह

कुछ दिनों बाद दोनों बालक वन विहार कर रहे थे, तभी उन्हें वहां कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आईं जो बेहद सुंदर थीं। राजकुमार धर्मगुप्त अंशुमती नाम की एक गंधर्व कन्या की ओर आकर्षित हो गया। कुछ समय बाद राजकुमार और अंशुमती दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे और कन्या ने राजकुमार को विवाह के लिए अपने पिता गंधर्वराज से मिलने के लिए बुलाया। कन्या के पिता को जब यह पता चला कि वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार है तो उसने भगवान शिव की आज्ञा से दोनों का विवाह कराया।

राजकुमार को मिला अपना राज्य

राजकुमार धर्मगुप्त की जिंदगी पटरी पर आ गई और धीरे-धीरे उसने गंधर्वों की मदद से अपनी गंधर्व सेना तैयार किया। फिर राजकुमार ने विदर्भ देश पर वापस आधिपत्य प्राप्त कर लिया। कुछ समय बाद उसे यह मालूम हुआ कि बीते समय में जो कुछ भी उसे हासिल हुआ है वह ब्राह्मणी और उसके द्वारा किए गए प्रदोष व्रत का फल था। उसकी सच्ची आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे जीवन की हर परेशानी से लड़ने की शक्ति दी। उसी समय से हिदू धर्म के मानने वाले प्रदोष व्रत के दिन शिवपूजा करने लगे और एकाग्र होकर प्रदोष व्रत की कथा सुनने लगे। मान्यता है जो व्यक्ति प्रदोष व्रत के दिन शिव पूजा कर एकाग्रो होकर शिवजी की कथा सुनेगा उसे सौ जन्मों तक कभी किसी परेशानी या फिर दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता।