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राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के साक्षी नहीं बन पाए, तो निराश न हों, राम तो भीतर ही हैं!

जो राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के साक्षी नहीं हो पाए उन्हें व्यथित नहीं होना चाहिए। ज्ञानियों ने कहा है ‘घट- घट राम बसत है भाई, ज्ञान बिन नहीं देत दिखाई’- राम तो हर जगह हैं, हर व्यक्ति में है। ज्ञान नहीं है, इसलिए दिखाई नहीं दे रहे।

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Ram Mandir Pran Pratishtha

जो राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के साक्षी नहीं हो पाए उन्हें व्यथित नहीं होना चाहिए। ज्ञानियों ने कहा है ‘घट- घट राम बसत है भाई, ज्ञान बिन नहीं देत दिखाई’- राम तो हर जगह हैं, हर व्यक्ति में है। ज्ञान नहीं है, इसलिए दिखाई नहीं दे रहे। राम तुम्हारे भीतर ही हैं और हर जगह हैं। जिनको तुम खोज रहे हो तुम्हारे भीतर ही वास करते हैं। अगर स्वयं में नहीं पा रहे तो कहीं भी नहीं पाओगे। जैसे कस्तूरी मृग उसके पास जो उपलब्ध है उसके लिए जीवन भर भटकता है। मंदिर का आशय होता है हर वो स्थान जहां जाकर मन बिल्कुल शुद्ध हो जाए। सबसे महत्वपूर्ण तो भीतर का मंदिर होता है। मन को मंदिर बनाना ही सबसे जरूरी बात है। मन मंदिर बन गया तो जीवन सार्थक है और मन मंदिर नहीं बना तो जीवन निरर्थक है।

रामलला की अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के बाद देश भर में उल्लास की नई लहर देखने को मिली। देखा जाए तो आज के हिन्दुओं के लिए तीन नाम ही हमारी चेतना के आराध्य हैं- ये हैं भगवान राम, कृष्ण और शिव। तीनों का सीधा सम्बन्ध वेदांत से हैं। गीता तो वेदांत का अहम स्तंभ है जिसे हम उपनिषदों का सार कहते हैं। कबीर के शब्दों में राम की परिभाषा तो अलग ही है। वे कहते हैं- निर्गुण- सगुण दोऊ से न्यारा, कहें कबीर सो राम हमारा। तो राम क्या है? आज के भारत को देखेंगे तो ये तीन नाम हैं जो हमारी चेतना के आराध्य है राम, कृष्ण और शिव। तीनों का ही सीधा सीधा सम्बन्ध वेदान्त से है। गीता तो वेदांत का अहम स्तम्भ है जिसे उपनिषदों का सार कहते हैं।

मुक्तिका उपनिषद में हनुमान जी श्रीराम से कह रहे हैं कि जीवन भर आपकी सेवा में लगा रहा और आपकी देह देखी है। आपकी लीलाएं देखी हैं। अब मुझे अपना वह स्वरूप बताइए जो उच्चतम है, सत्य है असली है और मुक्तिदायक है। मुक्तिका उपनिषद के पहले अध्याय के सातवें श्लोक में श्रीराम कहते हैं- हे हनुमान, अगर तुम मेरी सच्चाई जानना चाहते हो तो सुनो। ‘मैं वेदांत में वास करता हूं। जो सचमुच मुझे जानने के इच्छुक होंगे वे वेदांत की ओर आएंगे नहीं तो मेरे चार तल हैं यानी चार प्रकार हैं। इसी तथ्य को आगे संतों ने विस्तृत रूप से भी बताया है।

चार राम है जगत में, तीन राम व्यवहार।
चौथे राम में सार है ताका करो विचार।।
जो तीन राम हैं व्यवहार अर्थात जो हमारा कर्म है। जो आचरण है। हम नीचे के तीन रामों में ही सीमित रह जाते हैं। संतों ने कहा है कि चौथे राम में सार है, उनका विचार करो। सारख् असलियत, सच्चाई व मुक्ति तो चौथे राम में ही है।
एक राम दशरत घर डोले,
एक राम घट घट से बोले।
एक राम का सकल पसारा,
एक राम है सबसे न्यारा।।।
ज्यादातर लोग दशरथ के घर में जो राम हैं वहीं से शुरुआत करते हैं। एक राम घट- घट से बोले मतलब प्रत्येक व्यक्ति के भीतर से जो चेतना है वह दूसरे राम हैं। तीसरे राम जिसको हम कहते हैं ‘द आई टेंडेंसी’ यानी अहमवृत्ति। लेकिन जो असली राम है वो इन तीनों से अलग है। यही जो चौथे राम हैं जिन तक पहुंचने के लिए श्रीराम जी ने हनुमान को आदेश दिया। जो सचमुच श्रीराम के प्रेमी हों उन्हें वेदांत की ओर जाना ही पड़ेगा। वहां जाए बिना हम शिखर तक नहीं पहुंच सकते।

आचार्य प्रशांत
वेदान्त मर्मज्ञ,लेखक
पूर्व सिविल सेवा अधिकारी
संस्थापक, प्रशांत अद्वैत फाउंडेश

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