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सांस से निकलती है अग्नि, नाम है शुभंकरी, देती हैं अभय वरदान

मां कालरात्रि सदैव अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और शुभ फल देती हैं। यही कारण है कि मां को 'शुभंकरी' भी कहा जाता है।

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नवरात्रि में मां दुर्गा के सभी 9 रूपों की अपनी-अपनी महत्ता है। हर स्वरूप की आराधना करने के पीछे विशेष महत्व है। मां दुर्गा के किसी रूप की आराधन करने धन-वैभव मिलता है तो किसी रूप से संतान सुख। आज हम देवी दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप का बात करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की आराधना करने से अभय वरदान मिलता है, साथ ही ग्रह बाधाएं भी दूर होती है।

मां कालरात्रि का स्वरूप

मां कालरात्रि का शरीर रात के अंधकार की तरह काला है। इनकी सांस से अग्नि निकलती है, बाल बिखरे हुए हैं और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। देवी कालरात्रि के चार हाथ हैं। एक हाथ में कटार तो दूसरे हाथ में लोहे का कांटा है। जबकि अन्य हाथ वरमुद्रा औ अभय मुद्रा में है। मां कालरात्रि के तीन नेत्र हैं और मां का वाहन (गधा) है।

मां की कैसे हुई उत्पत्ति?

धर्म शास्त्रों के अनुसार, मां कालरत्रि की उत्पत्ति राक्षस चण्ड-मुण्ड के वध के लिए हुई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, दैत्यराज शुंभ की आदेश पर चण्ड-मुण्ड मां को पकड़ने के लिए अपनी सेना लेकर हिमालय पर्वत जाते हैं। वहां पहुंचने पर मां को पकड़ने का दुस्साहस करते हैं। इस पर मां को गुस्सा आ जाता है। मां को क्रोध इतना आता है कि उनका मुख लाल हो जात है और भौहें टेढ़ी हो जाती है। क्रोध से मां के शरीर का मांस सुख जाता है और केवल हड्डियों का ढांचा बच जाता है। ऐसा होने के कारण वह और भी ज्यादा विकराल रूप में नजर आती हैं। मुख विशाल होना और जीभ लपलपाने के कारण वह और भी डरावनी प्रतीत नजर आती हैं।

ऐसे करें मां की पूजा

धर्म शास्त्रों के अनुसार, मां कालरात्रि सदैव अपने भक्तों पर कृपा करती हैं और शुभ फल देती हैं। यही कारण है कि मां को 'शुभंकरी' भी कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, मां अपने भक्तों के भय को दूर करती हैं। नवरात्रि में मां को प्रसन्न करने के लिए गंगा जल, पंचामृत, पुष्प, गंध, अक्षत से पूजा करनी चाहिए। इन सबके अलावा मां को गुड़ से भोग लगाना चाहिए क्योंकि मां को गुड़ बहुत ही प्रिय है।