
यहीं हुआ था माँ पार्वती और भगवान शिव जी का विवाह
हिंदू धर्म शास्त्रों में भोले भंण्डारी भगवान शंकर जी एवं माता पार्वती के विवाह की महिमा उल्लेख अनेक रूपों में मिलता है, कहा जाता हैं कि इनका विवाह बड़े ही भव्य तरीके से संपन्न हुआ था । माता पार्वती के परिवार की तरफ से अनेक उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार विवाह में शामिल थे । परंतु भूत भावन भगवान शंकर की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, कहा जाता हैं कि शिवजी अजन्में है और उनका कोई परिवार नहीं हैं बल्कि वे स्वंय सभी के परिवार के कहे जाते है ।
शिवजी के रिस्तेदारों के रूप में शिव बारात में श्री ब्रह्माजी, श्री विष्णजी सहित सभी देवि देवता, सुर असुरों ने अपने सारे झगड़े भुलाकर एक साथ भोले बाबा के विवाह में उनके नाते रिस्तेदार बनकर पहुंचे थे । शिव पशुपति हैं, मतलब सभी प्राणियों के देवता भी हैं, इसलिए समस्त जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीवजंतुओं के अलावा भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी विवाह में शिवजी की तरफ से पहुंचे थे ।
इस जगह हुआ था विवाह
रुद्रप्रयाग में स्थित 'त्रियुगी नारायण' एक पवित्र जगह है, माना जाता है कि सतयुग में जब भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था तब यह ‘हिमवत’ की राजधानी था, इस जगह पर आज भी हर साल देश दुनियां भर से लोग संतान प्राप्ति के लिए इकट्ठा होते हैं और हर साल सितंबर महीने में 52 द्वादशी के दिन यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है ।
विवाह मंडप की अग्नि आज भी प्रज्वलित है
मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए त्रियुगीनारायण मंदिर से आगे गौरी कुंड कहे जाने वाले स्थान माता पार्वती ने तपस्या की थी, और बाद भगवान शंकर ने इसी मंदिर में माता पार्वती जी से विवाह किया था, कहते हैं कि उस हवन कुंड में आज भी वही अखण्ड अग्नि जल रही है ।
संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती हैं
संतान प्राप्ति की इच्छा वाले दम्पत्ति इस अग्नि का आशीर्वाद लेने के लिए देश ही नहीं बल्कि दुनियां भर के लोग लोग आते हैं, ऐसी मान्यता है कि भगवान केदारनाथ की यात्रा से पहले यहां दर्शन करने से ही माता पार्वती एवं शिवजी प्रसन्न होते हैं ।
Published on:
30 May 2018 06:39 pm
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