
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पंचक का हमारे जीवन में बड़ा ही महत्व है । जब चंद्रमा 27 नक्षत्रों में से अंतिम पांच में होता है तो उस अवधि को पंचक कहते है, और इसी कारण विशेष मुहूर्त दोष बनता है जिसमे कुछ कार्यों को करना मना किया गया है ।
पं. विष्णु राजोरिया, ज्योतिषाचार्य ने बताया, भचक्र में 27 नक्षत्र हैं, इनमें से अंतिम पांच नक्षत्रों को पंचक अवधि कहा गया है अर्थात धनिष्ठा नक्षत्र के तीसरे चरण से प्रारंभ होकर शतविषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, एवं रेवती ये पांच नक्षत्र पंचक के अंतर्गत आते हैं । पंचक प्रारम्भ होनें के दिन के अनुसार इसके पांच प्रकार है ।
पहला पंचक- यदि रविवार को सूर्योदय के समय या उसके बाद पंचक प्रारम्भ हो तो रोग पंचक कहलाता है । रोग पंचक में प्रारम्भ होनें वाले रोग सामान्यतः भारी कष्ट देते है । इसके निवारण हेतु केवल महामृत्युंजय मंत्र ही सहायक होता हैं- (ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !) का अनुष्ठान ही निवारण कर सकता है ।
दूसरा पंचक- राज पंचक, यह सोमवार से प्रारंभ होते है इस दिन राजकीय, शासकीय कार्य करना शुभ होता है ।
तीसरा पंचक- अग्नि पंचक यह मंगलवार से प्रारंभ होते है । इस पंचक में निर्माण, मशीन का शुभारंभ, औजार निर्माण, अशुभ फल देता है, तो वहीं मुकदमा कोर्ट के कार्यों में सफलता देता है ।
चौथा पंचक- चौर पंचक है । यह शुक्रवार को प्रारम्भ होते है । इस दिन व्यापार का शुभारंभ, धन का आदान प्रदान, मूल्यवान वस्तुओं का परिवहन नहीं करना चाहिए, अन्यथा भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है ।
पांचवा पंचक- मृत्यु पंचक, यह शनिवार से प्रारंभ होते है । इसमें यात्रा, जोखिम के कार्य, निर्माण, कदापि नहीं करना चाहिए ।
- पंचक कुम्भ एवं मीन राशि के चंद्र के दौरान क्रमशः धनिष्ठा, शतविषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, एवं रेवती नक्षत्र के काल को कहते है ।
- पंचक में सामान्य तौर पर नया चूल्हा लगाना, छत डालना, नए उपकरण बनाना, अंतिम संस्कार बिना निवारण के करना निषेध माना गया है । लेकिन वास्तुपूजन, प्राण प्रतिष्ठा, विवाह, आदि में इसका कोई औचित्य नहीं माना गया हैं ।
Published on:
17 May 2018 03:42 pm
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