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बेजोड़ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है राजाखेडा का प्राचीन मेहतेकी धाम
, घाटों पर बारीक नक्काशीसिटी टॉकिंग प्वाइंट
dholpur, राजाखेड़ा. रियासत काल से ही आस्था का प्रतीक एवं वास्तुशिल्प कला का नायाब उदाहरण मेहतेकी धाम व सरोवर राजकीय उपेक्षा और देखरेख के अभाव में दयनीय हालत में पहुंच चुका है ।जिसके चलते अब यहां पर होने वाला जलझूलनी एकादशी महोत्सव व ठाकुरजी का जलविहार भी जल के अभाव में मात्र सांकेतिक ही होने लगा है। सरकार और स्थानीय प्रशासन की उपेक्षा के चलते क्षेत्र की विरासत धीरे-धीरे खंडहर हो रही है। लोगों के अनुसार मेहतेकी हनुमान मंदिर व तालाब की स्थापना का कोई आधिकारिक दस्तावेज तो नहीं है, परंतु इसके स्थापत्य को देखते हुए यह माना जाता है कि इसका निर्माण रियासत काल से भी पहले लगभग 500 साल पूर्व होने दावा किया जाता है। एक परिवार चार पीडियों से इस मंदिर पर महंत का कार्य कर रही है। जिन्होंने बताया कि हनुमान मंदिर के साथ ही विशाल तालाब स्थापित था, जहां महिलाओं और पुरुषों के अलग-अलग घाटों के साथ आकर्षक विश्रांतों का भी निर्माण कराया गया था। जहां महिला एवं पुरुष पवित्र सरोवर में स्नान कर मंदिर के दर्शन प्राप्त करते थे। इन्हीं घाटों ओर विश्रांतों पर बारीक नक्काशी भी की गई है। सैकड़ों वर्ष तक इस तालाब से क्षेत्र का जलस्तर को स्थिर रखने में मददगार साबित होता रहा और जल संग्रहण का बड़ा केंद्र बना रहा। लेकिन आजादी के बाद से सरकारों की उपेक्षा इस तालाब पर भारी पडने लगी तो इसका महत्व भी कम होने लगा। तालाब के कैचमेंट एरिया में स्थापित हुई अनियमित कॉलोनिया व स्थानीय गांवों को जोडने के लिए गलत तरीके से बनाई सडकों ने यहां जलभराव को पूरी तरह रोक दिया। जिससे अब यह पवित्र सरोवर गंदे गड्ढे में तब्दील हो चुका है। अब लोग मिट्टी का खनन कर रहे हैं जिससे तालाब में जगह जगह गहरे गड्ढे होने से यह खतरनाक साबित हो रहा है।
आने वाले मानसून में लोगों को आस
अगर सरकार लोगों की अपेक्षाओं पर ध्यान दे तो आगामी मानसून से पूर्व इन आस्था केंद्र का जीर्णोद्धार करके भूजल पुनर्भरण को बढ़ाने के लिए तैयार कर सकती है। जिससे दोहरा लाभ होगा। बुजुर्ग ओमप्रकाश के अनुसार इन श्रोतों व्यर्थ बह जाने वाले पानी का संचय कर इनको आकर्षक तो बनाया ही जा सकता है। वहीँ मृतप्राय अवस्था मे पहुंच चुके क्षेत्र के भूजल पुनर्भरण के लिए भी ये महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। जिससे लोगों के कंठ भी तर हो सकते हैं।
हिंदू-मुस्लिम आस्था का प्रतीक
इसी तालाब में एक हिस्सा भूमि वक्फ बोर्ड की मिल्कियत भी है। जहां ताजियों को सुपुर्दे खाक किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों तक महिलाए व बालिकाएं फूलरिया भी यही विसंजित करती थी। जलझूलनी एकादशी को ठाकुरजी भी यही जलविहार करते थे लेकिन इस आस्था पर अब उपेक्षा भारी है और ये सभी कार्य सिर्फ सांकेतिक ही होने लगे हैं। तालाब को दोनों ही धर्म के लोग सम्पूर्ण आस्था के साथ महत्व देते हैं। वहीं सभी धर्मों के लोग इस तालाब में स्नान करने का बहुत महत्त्व चताते है लेकिन न तो राज्य सरकार न ही नगरपालिका और न ही वक्फ बोर्ड ने इस पुरा महत्व के स्थल पर कोई विकास किया है।
बन सकता है पर्यटन स्थल
लोगों का मानना है कि सरकार चाहे तो सरोवर का पुनर्निर्माण से आस्था के साथ-साथ इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में भी कर सकती है। जहां नौकायन भी संभव है। इससे जल स्तर में भी बड़ा परिवर्तन आने की संभावना है। वहीं नगरपालिका का राजस्व भी इससे बढ़ सकता है।।
Updated on:
15 Mar 2026, 7:16 PM IST
Published on:
15 Mar 2026, 7:16 PM IST
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