
-चहुंओर फैली गंदगी जिम्मेदारों की कार्यशैली करती बयां
-घर-घर से संग्रहण करने वाले टिपर हुए कबाड़
dholpur, राजाखेड़ा. महत्वकांक्षी योजना स्वच्छ भारत के नाम पर केन्द्र और राज्य सरकारों से मिलने वाले करोड़ों रुपयों का बंदरबाट हो रहा है। जिम्मेदार अधिकारी और नकारा सिस्टम आंखें बंद किए बैठा है। यही कारण है कि कस्बे में चहुंओर फैली गंदगी जिम्मेदारों की कार्यशैली को बयां करती हैं तो वहीं लोग खुले स्थानों में शौच जाने को मजबूर हैं, जबकि पालिका प्रशासन हर घर शौचालय बनवाने का दावा करता है।
खुले में शौच आदत या मजबूरी!
नगर पालिका क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग खुले में शौच जा रहे हैं, जबकी हर घर को शौचालय सरकार के अनुदान से बनवा दिए जाने का दावा सरकार और स्थानीय नगर पालिका वर्षों से कर रही है। बड़ी संख्या में सार्वजनिक शौचालय भी बना दिए गए हैं, उसके बाद भी अलसुबह से खेतों की ओर शौच के लिए जाते दिखना व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर रहा है साथ ही अब तक खर्च किये गए बजट पर भी सवाल उठ रहे है कि उसका परिणाम आखिर क्यों प्राप्त नहीं हो रहा।
नहीं रहते जिम्मेदार मुख्यालय पर
इस सबको रोकने के लिए अधिकारियों को चेम्बर्स से बाहर निकलकर क्षेत्र में नियमित भ्रमण की आवश्यकता होती है, लेकिन पालिका के अधिकारियों को आमजन ने कभी भी जमीनी जानकारी लेने के लिए सडक़ों पर नहीं देखा। जिम्मेदार अधिकारी मुख्यालय पर निवास भी नहीं करते और आगरा धौलपुर से कार्यालय समय पर भी नहीं आ पाते, ऐसे में अधीनस्थ कर्मचारी भी बेखोफ रहते हैं और वे भी अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने की जगह चाय की थडियों पर समय पास करते नजर आते हैं। जिला प्रशासन ने भी यहां के अधिकारियों की कर्यप्रणाली की न जाच की है न ही मुख्यालय पर रहने के लिए पाबंद ही किया है। यह हालात तो तब हैं जब पालिका की प्रशासक और उपखंड अधिकारी पालिका परिसर में ही अतिथि गृह में निवास करती हैं। उसके बाद भी कार्यालय के विषम हालात अलग कहानी दिखा रहे हैं।
दो दर्जन भट्टों पर नहीं शौचालय
नगर पालिका क्षेत्र के आबादी क्षेत्र में ही में दो दर्जन से अधिक ईंट भ_े अवैध व वैध रूप से संचालित हंै। प्रत्येक भट्टे पर औसतन 50 परिवार बिहार व उत्तरप्रदेश से मजदूरी करने आते हैं, ऐसे में लगभग एक हजार प्रवासी परिवार के लोग भी खुले में शौच जा रहे हैं, लेकिन पालिका के अधिकारियों ने कभी भी मौके पर जाकर हालात नहीं जांचे। न ही भट्टा मालिकों को भट्टों पर सार्वजनिक शौचालय निर्माण के लिए ही पाबंद किया न ही आबादी क्षेत्र में धुआं उगल रहे भट्टों पर कार्रवाई का ही प्रयास किया, जबकि इनमें से आधे तो बिना किसी औद्योगिक मंजूरी के ही क्षेत्र की आबोहवा को जहरीला बना रहे हैं।
कचरा बने कचरा एकत्रित करने वाले वाहन
केंद्र सरकार व राज्य सरकार की मदद से पालिका को बड़ी लागत से लगभग आधा दर्जन छोटे टिपर उपलब्ध करवाए गए थे। जिनसे घर-घर कचरा संग्रहण का कार्य किया जाना था, लेकिन एक दशक में ही इन कीमती वाहनों के दुरुपयोग व गलत उपयोग से यह पूरी तरह जर्जर हो गए और इन्हें कबाड़ में डाल दिया गया, जबकि इनकी मरम्मत और उपयोग के नाम पर निरंतर मोटी राशि और डीजल की खपत के आरोप स्थानीय लोग लगाते आ रहे हैं। इन आरोपों की जांच में होना लोगों के अनुसार इनको स्वीकार करना ही है। ऐसे में या तो इस प्रकरण की जांच कराई जाती या स्वीकार किए जाने पर जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाती, लेकिन दोनों में से कुछ नहीं हुआ और कचरा संग्रहण कागजों में ही एक ट्रिपर से चलता आ रहा है। ऐसे में 35 वार्डों से कैसे संग्रहण होता होगा यह भी उच्च स्तरीय जांच का विषय है।
Published on:
07 Apr 2026 06:40 pm
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