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धौलपुर से एक कविता रोज… आज अकेले खड़ी हुई है

आज अकेले खड़ी हुई है, भारत की एक अबला नारी। है लड़ाई मेरी नहीं, इंसानियत की है सारी।। जिसके चलते-चलते अब उसने है आवाज उठाई।। उसकी सच्चाई को दबाने बैठे है कुछ गीदड़।

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dholpur se ek kavita roj... aaj akele khadi huyi he..

धौलपुर से एक कविता रोज... आज अकेले खड़ी हुई है

धौलपुर से एक कविता रोज... आज अकेले खड़ी हुई है

आज अकेले खड़ी हुई है, भारत की एक अबला नारी।
है लड़ाई मेरी नहीं, इंसानियत की है सारी।।
जिसके चलते-चलते अब उसने है आवाज उठाई।।
उसकी सच्चाई को दबाने बैठे है कुछ गीदड़।
तोड़ दिया उसका आशियना जो था रोजी रोटी उसकी।।
दी उसकी हिम्मत को जो गाली।
विफर पड़ी वो अबला नहीं महाकाली।।
खाई कसम उसने बन झांसी वाली।
नहीं दबेगी ये हिन्द की अबला नारी।।
मिटने न देगी अस्तित्व नारी का।
अब लड़ाई सीधी कुर्सी से नारी की।।
कहते जो खुद को वीर है ।।
देते वहीं गालिया नारी को कुर्सी की खातिर।।
कब तक गुंडागर्दी को खुले आम आम दिखलाते जाओगे।
समय आ गया सच्चाई का नहीं झुकेगी नारी।।
रह जाएंगे एक दिन देखते अपनी बर्बादी को ।।
सदियों तक जीत के किस्से गाए जाएंगे ।।
एक अबला नारी ने कलयुग में जीता संग्राम को।
सदा याद रखा जायेगा हिन्दुस्तानी नारी की हिम्मत और बलिदान को।।

कृष्णा वंदना झा, राजाखेड़ा
कवियित्री डॉ. बीआर अम्बेडकर विश्विद्यालय से विज्ञान स्नातक है और दिल्ली के काव्य मंचों तक महिलाओं से जुड़े मुद्दों को प्रखरता से उठाती रही हैं।