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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत कल, गजानन के छठे स्वरूप की होती है पूजा

- सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का आर्शीवाद प्रदान करते हैं विघ्निहर्ता - धौलपुर. हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पावन पर्व मनाया जाता है। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी कहते हैं

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 Dwijapriya Sankashti Chaturthi fasts tomorrow, 6th form of Gajanan is worshipped

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत कल, गजानन के छठे स्वरूप की होती है पूजा

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत कल, गजानन के छठे स्वरूप की होती है पूजा

- सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का आर्शीवाद प्रदान करते हैं विघ्निहर्ता

- धौलपुर. हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पावन पर्व मनाया जाता है। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी कहते हैं। वहीं, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार विघ्नहर्ता द्विजप्रिय भगवान गणेश के चार सिर और चार भुजाएं हैं। मान्यता है कि भगवान गणेश के इस स्वरूप की विधि विधान से पूजा अर्चना करने से सभी कष्टों का निवारण होता है और स्वस्थ जीवन के साथ सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही संतान प्राप्ति के लिए भी ये व्रत बेहद खास माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेशजी के नाम मात्र का स्मरण करने से मनुष्य के सभी दुख दूर होते हैं। पंचांग के अनुसार द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रविवार को रखा जाएगा। चतुर्थी की शुरुआत शनिवार को रात्रि 9:56 बजे से होगी, जिसका समापन रविवार की रात्रि 9:05 बजे होगा। संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रोदय रात्रि 9:50 पर होगा। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्वभगवान गणेश सभी देवी देवताओं में प्रथम पूजनीय माने जाते हैं। विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा अर्चना के बाद ही अन्य देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस दिन व्रत कर विधिवत गौरीपुत्र गणेशजी की पूजा अर्चना करने से भगवान गणेश का आशीर्वाद अपने भक्तों पर सदैव बना रहता है और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। लेकिन ध्यान रहे चंद्र दर्शन के बाद ही द्विजप्रिय संकष्टी व्रत संपूर्ण माना जाता है। इसलिए चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य दें और पूजन करें। ब्रह्म पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार स्वयं ब्रह्माजी ने संकष्टी चतुर्थी के व्रत की महत्ता का उल्लेख किया है। ऐसे करें द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर पूजा प्रात:काल उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। घर में मंदिर की साफ-सफाई करें। भगवान गणेश को उत्तर दिशा की तरफ मुंह करके जल अर्पित करें। जल अर्पित करने से पहले उसमें तिल अवश्य डाल लें। दिनभर उपवास रखें। शाम को विधि-विधान के साथ भगवान गणेश की पूजा करें। भगवान गणेश की आरती उतारें, भोग में लड्डू या मोदक चढ़ाएं। रात में चांद देखकर अघ्र्य दें। लड्डू, मोदक या तिल खाकर व्रत खोलें। तिल का दान करें।

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