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सौ करोड़ खर्च, आधुनिक ओटी, चार आर्थो सर्जन फिर भी ऑपरेशन निजी अस्पतालों में

-जिला अस्पताल आने वाले हड्डी के मरीजों के नहीं किए जाते ऑपरेशन – मरीज अन्य शहरों या फिर निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर – दर्द और कैल्शियम की गोली तक सीमित ऑर्थो मरीजों का इलाज धौलपुर. 100 करोड़ खर्च, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का वादा, आधुनिक ऑपरेशन थिएटर, चार ऑर्थो पेडिक सर्जन उसके बावजूद भी […]

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सौ करोड़ खर्च, आधुनिक ओटी, चार आर्थो सर्जन फिर भी ऑपरेशन निजी अस्पतालों में Hundred crore rupees spent, modern OT, four ortho surgeons, yet operations are done in private hospitals

-जिला अस्पताल आने वाले हड्डी के मरीजों के नहीं किए जाते ऑपरेशन

- मरीज अन्य शहरों या फिर निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर

- दर्द और कैल्शियम की गोली तक सीमित ऑर्थो मरीजों का इलाज

धौलपुर. 100 करोड़ खर्च, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का वादा, आधुनिक ऑपरेशन थिएटर, चार ऑर्थो पेडिक सर्जन उसके बावजूद भी जिला अस्पताल में आर्थो के ऑपरेशन नहीं हो रहे। मजबूरन मरीजों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ रहा है। जिला अस्पताल में हड्डी से संबंधित मरीजों का इलाज सिर्फ दर्द और कैल्शियम की गोली तक ही सीमित होकर रह गया है।

राज्य सरकार ने धौलपुर जिले को आधुनिक जिला अस्पताल के रूप में बड़ी सौगात दी थी। जिस पर लगभग १०० करोड़ रुपए भी खर्च किए गए जिससे जिले के मरीजों को परेशानियों का सामना न करना पड़े, लेकिन इस सबके बावजूद भी जिले के मरीज बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर हैं। कारण...जिम्मेदारों की लचर कार्यप्रणाली। जिला अस्पताल में इस वक्त चार ऑर्थो पेडिक सर्जन मौजूद हैं, आधुनिक ऑपरेशन थियेटर भी उपलब्ध है, लेकिन उसके बावजूद भी हड्डी रोग से पीडि़त मरीजों का ऑपरेशन जिला अस्पताल में पूर्ण रूप से बंद है। ऑर्थो सर्जन मरीजों के ऑपरेशन में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे, रही सही कसर अस्पताल प्रबंधन पूरी कर रहा है, जो यह सब देखकर भी अनदेखा कर रहा है। देखा जाए तो जिला अस्पताल में ऑर्थो मरीजों का इलाज केवल दर्द का ट्यूब, दर्द और कैल्शियम की गोली तक ही सीमित होकर रहा गया है। अगर किसी मरीज का ऑपरेशन होना है तो उसके यां तो अन्य शहर जाना पड़ता है या फिर इन्हीं आर्थो सर्जनों के निजी क्लीनिक पर जाकर जेब ढीली करनी पड़ती है।

कमीशनखोरी और अपना धंधा चामकाने का काम

देखा जाए तो यह सब कमीशनखोरी और अपना धंधा चमकाने का काम किया जा रहा है। जिला अस्पताल में इलाज कराने आए मरीजों ने बताया कि अस्पताल में हड्डी से संबंधित कोई ऑपरेशन नहीं होता है। जब डॉक्टरों से ऑपरेशन की कहते हैं तो वह ऑपरेशन अन्यंत्र जगह कराने की बात कहते हैं। अब ऐसी स्थिति में अगर मरीज दूसरे डॉक्टर की क्लीनिक पर जाता है तो वहां से कमीशन और अगर मरीज जिला अस्पताल के डॉक्टरों के ही निजी क्लीनिकों पर जाता है तो फिर मोटी फीस। देखा जाए तो दोनों ही मामलों में डॉक्टरों के दोनों ही हाथों में लड्डू हैं, फिर चाहे मरीज चकरघिन्नी होता क्यों न फिरे और हजारों रुपए अपने इलाज में फूंक दे।

डॉक्टरों की जगह इंटर्न कर रहे इलाज

जिला अस्पताल में आने वाले मरीजों के इलाज की जिम्मेदारी डॉक्टरों पर होती है, लेकिन अस्पताल की ओपीडी में डॉक्टर ही नदारद रहते हैं। हां सुबह-सुबह कुछ वक्त के लिए जरूर डॉक्टर आपको कुर्सियों पर दिख जाएंगे, लेकिन थोड़ी देर के बाद डॉक्टरों की इन कुर्सियों पर इंटर्नों का राज हो जाता है और डॉक्टर अपनी निजी क्लीनिकों पर मरीजों का इलाज कर रहे होते हैं। यही हाल ऑर्थो विभाग का भी है जहां, मरीजों का इलाज इंटर्न कर रहे हैं, तो वहीं चोटिल मरीजों के प्लास्टर डॉक्टर नहीं बल्कि बार्ड बॉय से लेकर चपरासी तक चढ़ा रहे हैं। अब ऐसी स्थिति में मरीजों के साथ कोई अनहोनी होती है तो उसका जिम्मेदार कौन होगाï? ऐसा नहीं है कि अस्पताल प्रबंधन को इसकी जानकारी नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि जानकारी होने के बावजूद भी अस्पताल की व्यवस्थाओं को सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए जाते।

पर्चा काउंटर अब भी दो, मरीज परेशान

जिला अस्पताल में दिन प्रतिदिन मरीजों की भीड़ बढ़ रही है और ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या 1700-1800 तक को पार कर चुकी है, लेकिन उसके बाद भी मरीजों का पर्चा काटने केवल दो ही काउंटरों का उपयोग किया जा रहा है। जिससे गंभीर मरीजों से लेकर बुजुर्ग और महिला मरीजों को घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है, जबकि नियमानुसार मरीजों की संख्या देखते हुए अस्पताल प्रशासन और काउंटर बढ़ा सकता है। गत १५ दिन पहले राजस्थान पत्रिका ने यह मामला उठाया भी थी, तब अस्पताल प्रबंधन ने जल्द ही काउंटर बढ़ाने की बात कही, लेकिन यह बात सिर्फ बात तक ही सीमित होती दिख रही है।

रोगी मित्रों का कहीं अता पता नहीं

राज्य सरकार आदेशानुसार जिला अस्पताल में गंभीर मरीजों के लिए रोगी मित्र (पेसेंट काउंसलर) संविदा पर नियुक्त किए हुए हैं। जिनका कार्य गंभीर और असहाय मरीज का पर्चा बनवाना, डॉक्टर को दिखवाना और मरीज को वार्ड तक छोडऩे तक का रहता है, लेकिन जिला अस्पताल में रोगी मित्र हेल्प डेस्क के यप में कोई कार्य नहीं कर रहे, अपितु मरीजोंं को पता ही नहीं होगा कि उनकी सहायता के लिए सरकार ने रोगी मित्रों को तैनात कर रखा है। जानकारी के अनुसार यह रोगी मित्र अपना काम छोड़ जिम्मेदारों की चाटुकारिता और चापलूसी करने में व्यस्त रहते हैं।

जिला अस्पताल में जल्द ही हड्डी से संबंधित मरीजों का ऑपरेशन किया जाएगा। जिसको लेकर हमने सर्जन चिकित्सक की डिमांड की थी, जिनकी नियुक्ति हो चुकी है। अब तक जो सर्जन थे वह परिपूर्ण नहीं थे।

-समरवीर सिंह, प्रमुख चिकित्सा अधिकारी धौलपुर