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कोरोना के बाद आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में लोगों का बढ़ा रुझान

- लोग स्वस्थ्य रहने के लिए आदर्श दिनचर्या, रात्रिचर्या, योग, पंचकर्म चिकित्सा का ले रहे लाभ धौलपुर. आयुर्वेद विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है जो की अनादि एवं शाश्वत है। आयुर्वेद की उत्पत्ति भी ऋग्वेद काल से हुई। ऋग्वेद के अलावा अथर्ववेद में भी आयुर्वेद का उल्लेख मिलता है

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Increased trend of people in Ayurveda medicine after Corona

कोरोना के बाद आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में लोगों का बढ़ा रुझान

कोरोना के बाद आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में लोगों का बढ़ा रुझान


- लोग स्वस्थ्य रहने के लिए आदर्श दिनचर्या, रात्रिचर्या, योग, पंचकर्म चिकित्सा का ले रहे लाभ

धौलपुर. आयुर्वेद विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है जो की अनादि एवं शाश्वत है। आयुर्वेद की उत्पत्ति भी ऋग्वेद काल से हुई। ऋग्वेद के अलावा अथर्ववेद में भी आयुर्वेद का उल्लेख मिलता है अर्थात आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद माना जाता है। आयुर्वेद चिकित्सा को सबसे प्राचीन और अच्छी तरह से परखी हुई पद्धति माना जाता है। हमारे देश में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के तहत लोगों का इलाज वर्षों से होता आया है। आज से कुछ समय पहले भारत के अधिकांश गांवों में वैद्य हुआ करते थे जो लोगों का संपूर्ण इलाज आयुर्वेद की जड़ी-बूटियों के माध्यम से करते थे।

आज भी देश के कई ऐसे इलाके हैं, जहां लोगों का इलाज इसी पद्धति से किया जाता है। लेकिन अंग्रेजी दवाइयों के आने के बाद आयुर्वेद के प्रति लोगों का रुझान कम होता गया लेकिन कोरोना काल में आयुर्वेद की महत्वता एवं उपयोगिता को ना केवल भारत में जाना अपितु पूरी दुनिया ने भी इसको अपनाया।

आयुष मंत्रालय के अनुसार देश का कुल आयुष और हर्बल दवाओं का निर्यात 2014 में 1.09 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढकऱ 2020 में 1.54 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। प्रतिवर्ष 5.9 प्रतिशत की वृद्धि हुईे। जो कि आयुर्वेद के प्रति लोगों के रुझान को प्रमाणित करता है। उधर, वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी राजकीय आयुर्वेद औषधालय कासिमपुर डॉ.विनोद गर्ग ने बताया कि ने बताया कि कोरोना काल के बाद से आम जनता आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति भी अपनाने लगी हैं और छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी प्रारंभिक अवस्था में आयुर्वेद चिकित्सा ले रहे हैं।

आयुर्वेद के प्रति लोगों का रुझान बढऩे के कई कारण

स्वस्थ जीवन जीने की संपूर्ण विधा है आयुर्वेद, आयुर्वेद पहला सुख निरोगी काया के सिद्धांत को मानता है। आयुर्वेद का प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना है। आयुर्वेद इस सिद्धांत पर कार्य नहीं करता कि जब व्यक्ति बीमार हो तभी इलाज किया जाए अपितु आयुर्वेद में व्यक्ति बीमार ही ना हो इसके लिए सभी ग्रंथों में आदर्श दिनचर्या, ऋतुचर्या, रात्रिचर्या, रसायन चिकित्सा, सद्वृत्त पालन, योगाभ्यास एवं त्रयोपस्तम्भ (आहार) निद्रा, ब्रह्मचर्य का सम्यक पालन करने का निर्देश दिया है। इन सभी उपायों के सम्यक पालन से व्यक्ति न केवल शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहता है अपितु पूर्ण ऊर्जावान एवं रोगों से मुक्त रहता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक औषधियां

वहीं रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने में सहायक औषधियों की उपलब्धता है। कई बार बच्चों, बड़ों और वृद्धावस्था में रोग-प्रतिरोधक शक्ति कम होने से बार-बार कई रोगों प्रतिश्याय, कास, ज्वर, एलर्जी, त्वक विकार, संधिशूल आदि से ग्रसित हो जाते हैं। इनके लिए आयुर्वेद चिकित्सक के निर्देशानुसार अश्वगंधा, गिलोय, आमला, मुलेठी, पिपली, तुलसी, कालमेघ, च्यवनप्राश आदि का उपयोग भी किया जा रहा है।

आहार नियमों का हो पालन हो

आयुर्वेद की चरक संहिता में खानपान से संबंधित अनेक नियमों का पालन करने से मनुष्य की स्वस्थ रहने में महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें अध्यशन अर्थात किए हुए भोजन के पचने से पहले द्वारा या पुन: भोजन ना खाएं, विरुद्ध आहार जैसे दूध के साथ अम्ल पदार्थ व मूली का सेवन तथा घी और शहद बराबर मात्रा में नहीं लेना है। आयुर्वेद में बताया कि मनुष्य को इतना भोजन करना चाहिए कि अमाशय का एक भाग ठोस पदार्थों के लिए, एक भाग द्रव पदार्थ के लिए एवं एक भाग गैसों के आदान-प्रदान के लिए रह जाए।