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सभी तीर्थों का भांजा है मचकुण्ड,यहां स्न्नान करने से चर्म रोग संबन्धी पीड़ाओं से मिलता छुटकारा

धौलपुर. धौलपुर के जी.टी. रोड से तीन किलोमीटर दूर अरावली पर्वत श्रंखलाओं की गोद में स्थित है सुरम्य प्राकृतिक सरोवर मुचुकुण्द को सभी तीर्थों के भान्जा कहा जाता है। एक बड़े पवित्र तालाब के चारों ओर घिरे 108 मंदिरों की श्रृंखला का नाम है तीर्थराज मुचुकुन्द। भगवान श्रीराम से उन्नीस पीढ़ी पहले, 24वें सूर्यवंशी राजा मुचुकंद के नाम से पहचाना जाता है।

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Machkund is the nephew of all pilgrimages, getting relief from skin related pains by taking a bath here

सभी तीर्थों का भांजा है मचकुण्ड,यहां स्न्नान करने से चर्म रोग संबन्धी पीड़ाओं से मिलता छुटकारा

सभी तीर्थों का भांजा है मचकुण्ड,यहां स्न्नान करने से चर्म रोग संबन्धी पीड़ाओं से मिलता छुटकारा
-देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में रखता है विशेष स्थान
धौलपुर. धौलपुर के जी.टी. रोड से तीन किलोमीटर दूर अरावली पर्वत श्रंखलाओं की गोद में स्थित है सुरम्य प्राकृतिक सरोवर मुचुकुण्द को सभी तीर्थों के भान्जा कहा जाता है। एक बड़े पवित्र तालाब के चारों ओर घिरे 108 मंदिरों की श्रृंखला का नाम है तीर्थराज मुचुकुन्द। भगवान श्रीराम से उन्नीस पीढ़ी पहले, 24वें सूर्यवंशी राजा मुचुकंद के नाम से पहचाना जाता है।
तीर्थराज मचकुण्ड देश में प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष महत्व है। यहां 108 प्राचीन मंदिरों की श्रृंखला, पवित्र सरोवर के चारों ओर एक किलो मीटर परिक्रमा मार्ग, हर अमावस्या पर संपूर्ण तीर्थ की परिक्रमा, हर पूर्णिमा पर कुंड की पूजा-आरती, सन् 1612 से शेर शिकार गुरुद्वारा का निर्माण मुख्य आकर्षण का केन्द्र है। हर वर्ष ऋ षि पंचमी व बलदेव छठ को लक्खी मेला लगता है। मेले में लाखों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं। शादियों की मौरछड़ी व कलंगी का विसर्जन भी करते है। माना जाता है कि यहां स्नान करने से चर्म रोग सम्बन्धी समस्त पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है। तीर्थराज मुचुकुण्द का मुख्य आकर्षण चार मन्दिरों में निहित है।
तीर्थराज मुचुकुण्द का इतिहास
जानकारों के अनुसार त्रेता युग में महाराजा मान्धाता के तीन पुत्र हुए, अमरीष, पुरू और मुचुकुण्द। युद्ध नीति में निपुण होने से देवासुर संग्राम में इंद्र ने महाराज मुचुकुण्द को अपना सेनापति बनाया। युद्ध में विजय श्री मिलने के बाद महाराज मुचुकुण्द ने विश्राम की इच्छा प्रकट की। देवताओं ने वरदान दिया कि जो तुम्हारे विश्राम में खलल डालेगा, वह तुम्हारी नेत्र ज्योति से वहीं भस्म हो जायेगा। देवताओं से वरदान लेकर महाराज मुचुकुण्द श्यामाष्चल पर्वत(जहां अब मौनी सिद्ध बाबा की गुफा है) की एक गुफा में आकर सो गए। इधर जब जरासंध ने कृष्ण से बदला लेने के लिए मथुरा पर 18वीं बार चढ़ाई की तो कालियावन भी युद्ध में जरासंध का सहयोगी बनकर आया। कालियावन महर्षि गाग्र्य का पुत्र व म्लेक्ष्छ देश का राजा था। वह कंस का भी परम मित्र था। भगवान शंकर से उसे युद्ध में अजय का वरदान भी मिला था। शंकर ने वरदान को पूरा करने के लिए कृष्ण रण क्षेत्र छोड़कर भागे। तभी कृष्ण को रणछोड़ भी कहा जाता है। कृष्ण को भागता देख कालियावन ने उनका पीछा किया। मथुरा से करीब सवा सौ किमी दूर तक आकर श्यामाश्चल पर्वत की गुफा में आ गये, यहां मुचुकुण्द महाराज सो रहे थे। कृष्ण ने अपनी पीताम्बरी मुचुकुण्द के ऊपर डाल दी और खुद एक चट्टान के पीछे छिप गए। कालियावन भी पीछा करते करते उसी गुफा में आ गया। दंभ मे भरे कालियावन ने सो रहे मुचुकुण्द को कृष्ण समझकर ललकारा। मुचुकुण्द जगे और उनकी नेत्र की ज्वाला से कालियावन वहीं भस्म हो गया। यहां भगवान कृष्ण ने मुचुकुण्द जी को विष्णुरूप के दर्शन दिए। मुचुकुण्द दर्शनों से अभिभूत होकर बोले-हे भगवान! तापत्रय से अभिभूत होकर सर्वदा इस संसार चक्र में भ्रमण करते हुए मुझे कभी शांति नहीं मिली। देवलोक का बुलावा आया तो वहां भी देवताओं को मेरी सहायता की आवश्कता हुई। स्वर्ग लोक में भी शांति प्राप्त नही हुई। अब मै आपका ही अभिलाषी हूँ कृष्ण के आदेश से महाराज मुचुकुण्द जी ने पाँच कुण्डीय यज्ञ किया। यज्ञ की पूर्णाहुति ऋ षि पंचमी के दिन हुई। यज्ञ में सभी देवी-दवताओ व तीर्थों को बुलाया गया। इसी दिन कृष्ण से आज्ञा लेकर महाराज मुचुकुण्द गंधमादन पर्वत पर तपस्या के लिए प्रस्थान कर गए। वह यज्ञ स्थल आज पवित्र सरोवर के रूप में हमें इस पौराणिक कथा का बखान कर रहा है। सभी तीर्थो का नेह जुड जाने से इसे तीर्थों का भांजा भी कहा जाता है। हर वर्ष ऋ षि पंचमी व बलदेव छठ को जहाँ लक्खी मेला लगता है। मेले में लाखों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं। शादियों की मौरछड़ी व कलंगी का विसर्जन भी जहाँ करते है। माना जाता है कि यहां स्न्नान करने से चर्म रोग संबन्धी समस्त पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है।