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परिषद के विकास के दावे खोखले, शहर की सडक़ों से लेकर चैम्बर और नालों का हाल बेहाल

नगर परिषद के शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के दावे और वादे दोनों ही दूर की कौड़ी साबित हुए। न तो शहर की सडक़ों का निर्माण हो सका न ही शहरवासियों को गंदगी से राहत मिली और न ही शहर का ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त हो सका। परिणाम...आज पहले से ज्यादा परेशानियां शहरवासियों को झेलनी पड़ रही है और लाखों दुश्वारियों के बीच शहर की जनता आज भी विकास की राहत जोह रही है।

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परिषद के विकास के दावे खोखले, शहर की सडक़ों से लेकर चैम्बर और नालों का हाल बेहाल The council's development claims are hollow, with the city's roads, chambers, and drains in abysmal conditions

-25 करोड़ से शहर में विकास कार्यों का खींचा था खाका...काम 25 लाख का भी नहीं

-शहर की सडक़ों से लेकर, चैम्बर और नालों की कहानी वही पुरानी

-प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों परिषद की बागड़ोर, लोगों को उनसे आस

-काम नहीं तो नई सरकार और नए राजा का चार माह करना होगा इंतजार

धौलपुर. नगर परिषद के शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के दावे और वादे दोनों ही दूर की कौड़ी साबित हुए। न तो शहर की सडक़ों का निर्माण हो सका न ही शहरवासियों को गंदगी से राहत मिली और न ही शहर का ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त हो सका। परिणाम...आज पहले से ज्यादा परेशानियां शहरवासियों को झेलनी पड़ रही है और लाखों दुश्वारियों के बीच शहर की जनता आज भी विकास की राहत जोह रही है।

तत्कालीन नगर आयुक्त अशोक शर्मा ने शहरवासियों को सपना दिखाते हुए विकास के बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन हुआ इसके उलट। शहर का विकास नहीं हो सका, लेकिन परिषद के कर्मचारी और अधिकारी अपना विकास करते हुए एसीबी के हत्थे चढ़ गए, और इसी भ्रष्टाचार की जांच की आंच नगर आयुक्त तक भी पहुंचने से उन्हें भी अपना पद त्यागना पड़ा। लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान और उनके जाने, बोर्ड भंग और प्रशासन पर परिषद की बोगडोर आने के बाद भी शहर में कोई भी विकास कार्य नहीं हो सका। आलम यह है कि शहर के प्रत्येक सडक़ें गड्ढों में लुप्त हो चुकी हैं और सुबह से लेकर शाम तक लोगों को धूल की सौगात स्वरूप बीमारियां बांट रही हैं। नगर परिषद ने उस समय 25 करोड़ रुपए खर्च कर विकास करने की बात की, लेकिन काम 25 लाख तक नहीं हो सका। इसमें से 12 करोड़ रुपए चौक चैम्बरों और नालों पर खर्च करने तो 13 करोड़ रुपए शहर की सडक़ों सहित सौंदर्यीकरण कराने का दंभ भरा था, लेकिन पांच से छह माह बाद भी अभी तक सडक़ निर्माण तो दूर सडक़ निर्माण के लिए बजट ही सेंशन नहीं हो सका है। कारण सडक़ निर्माण की फाइल जयपुर डीएलबी में ही अटकी पड़ी है।

हो हल्ला जमकर...लेकिन चैम्बर अब भी ओवरफ्लो

चैम्बरों और नालों की हालत जस की तस बनी हुई है। परिषद ने चैम्बरों की सफाई के लिए निजी कंपनी को शहर में बिछी 171 किमी लंबी सीवर लाइन के मेंटेनेंस का कार्य टेण्डर प्रक्रिया के माध्यम से ठेका सौंपा था। टेण्डर 2 करोड़ 20 लाख रुपए में किया गया, जिसमें संवेदक 3 साल तक इन चेम्बरों की साफ-सफाई और मेंटेनेंस कार्य करना था, लेकिन वर्कऑर्डर जारी होने के सात माह बाद भी शहर के चेम्बरों की हलत नरकीय बनी हुई है। मानसून सीजन तो छोड़ो आज की हालत में एक दर्जन कालोनियों के 20 हजार लोग चैम्बरों की उफनती गंदगी से जूझ रहे हैं। निवासियों का आरोप है कि नगर पालिका प्रशासन और अधिकारी इस गंभीर समस्या पर ध्यान नहीं दे रहे हैं जिससे स्वस्थ एवं स्वच्छ धौलपुर अभियान केवल कागजों तक सीमित रह गया है।

अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई का परिणाम सिफर

शहरवासियों को नगर परिषद की छितर-बितर अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई का परिणाम भी कुछ नहीं मिल सका और आज भी शहर अतिक्रमण की मार से कराह रहा है। परिषद ने 2025 के आगाज से शहर की सडक़ों को चौड़ा करने के नाम पर अभियान चलाया था, लेकिन कुछ दिनों में यह अभियान प्वाइंट टू प्वाइंट पर आ गया। आज किसी कालोनी में अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर गर्जा तो कल कहीं और जिसका लोगों ने विरोध भी किया, लेकिन नगर परिषद के आगे उनकी एक न चल सकी और अब अभियान भी कड़ाके की ठण्ड के साथ ठण्डा हो गया, लेकिन उन लोगों को दर्द दे गया, जिनकी आधार खुद नगर परिषद या फिर अन्य संस्थाओं ने ही रखी थी।

फाइलों में गुम...शहर को ग्रीन करने की बातें

शहर को क्लीन करने के बाद शहर को ग्रीन करने के नाम पर परिषद शहर के चौक चौराहों पर फ्लोवरिंग प्लांट्स लगाने और हथ ठेला लगाने वालों के लिए चौपाटी बनाने का भी जोर शोर से हल्ला मचाया गया था, लेकिन यह बातें भी अभी तक सिर्फ बातें ही बनकर रह गईं, हां सैंपऊ रोड पर जरूर डिवाइडरों पर कुछ पौधे लगाने का काम किया गया था, तो वहीं नर्सरी क्षेत्र में सीवरेज प्लांट लगाने का प्रस्ताव जरूर पास हो गया था, जबकि अन्य विकास कार्यों की बाट अब भी शहर की जनता जोह रही है।

स्थायी नगर आयुक्त की बाट जोह रही परिषद

शहर की सरकार कही जाने वाली नगर परिषद की हालत अब बदतर हो चुकी है। हालात यह हैं कि परिषद के वाहनों में डीजल तक डराने के लिए आर्थिक हालात भी सही नहीं। परिषद पिछले पांच माह से एक स्थायी नगर आयुक्त की बाट जोह रहा है, अभी तक प्रभार के सहारे की काम चलता आ रहा है, जो सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। तो वहीं अब बोर्ड भंग होने के साथ परिषद पूर्ण रूप से प्रशासनिक अधिकारियों के सहारे है, जबकि नई सरकार चुनने में अभी तीन माह का समय शेष है। ऐसे में लोगों को चुने हुए प्रतिनिधि नहीं प्रशासनिक अधिकारियों से कुछ करने की आस है। नहीं तो फिर नई सरकार और नए राजा के इंतजार में लोगों को चार से पांच माह इंतजार करना होगा।