
-अपना हक पाने सालों से ठोकर खा रहे कार्यस्थलों पर विकलांग हुए पक्षकार
-श्रम विभाग में कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त नहीं होने से सौ से ज्यादा दावे लंबित
-२० दावों की न्यायालय में सुनवाई पूरी एफडी बनी, पर सहायत अभी तक नहीं
धौलपुर.एक हाथ में बैशाखी, दूसरे में कागजात और चेहरे पर दुविधा लिए उस्मान दो साल से श्रम कार्यालय की सीढिय़ां चढ़ रहा है। 18 साल पहले हादसे में पति को गवा चुकी ममता की आंखों का पानी भी सिस्टम की घोर लापवाही ने सुखा डाला है, जिसकी बेटी की शादी 5 मई की है। यह कहानी इन दो लोगों की नहीं, बल्कि जिले के एक सैकड़ा से ज्यादा लोगों की है जो अपने हक के लिए दर-दर की ठोकर खा रहे हैं। इनमें किसी का एक पैर नहीं तो किसी का एक हाथ नहीं...तो कोई अपनी जान तक गंवा चुका है, लेकिन सालों साल बाद भी इन लोगों को मिला है तो बस सब्र...लाचारी और इंतजार।
कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम...हां यह वह एक भारतीय कानून है जो कार्यस्थल पर दुर्घटना के कारण चोट, विकलांगता या मृत्यु होने पर कर्मचारियों और उनके आश्रितों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है। यह नियोक्ताओं को घायल कर्मचारी को मुआवजा देने के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार बनाता है। लेकिन जिला श्रम कार्यालय में कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त के नहीं होने से कारण श्रमिक क्षतिपूर्ति के लगभग 100 से ज्यादा दावे लंबित हैं, जिनकी न्यायालय में सुनवाई तक हो चुकी है। जिससे घायल श्रमिकों और मृतक आश्रितों को आर्थिक सहायता पाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा 18 साल पुराने ऐसे 15 से 20 केस भी पेंडिंग हैं जिनका निस्तारण हो चुका है और न्यायालय में एफडी भी पूरी हो चुकी है, लेकिन कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त के न होने से मामला आगे कैसे बढ़े? नतीजतन 100 से ज्यादा दिव्यांग पीडि़त पक्षकार अपने हक के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। जिनके आगे रोजी रोटी का भी संकट आन खड़ा है।
भरतपुर कार्यालय ने किया सुनवाई से इनकार
जिला श्रम कार्यालय में कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त की कमी सदा ही खलती रही है। जिस कारण इन मामलों की लगातार सुनवाई नहीं हो पाई। अगस्त 2024 में आखिरी बार शिवचरण मीणा की उपस्थिति में लंबित केस पर सुनवाई हुई थी। तब से लोगों का इंतजार ही चल रहा है। ऐसा नहीं है इसकी जानकारी विभाग के आला अधिकारियों को न हो। जयपुर श्रम विभाग ने मार्च 2025 मामलों से संबंधित फाइलों को निस्तारण के लिए भरतपुर भेजने के आदेश भी दिए, लेकिन भरतपुर में बैठे जिम्मेदारों ने सुनवाई करने को लेकर अपने हाथ खड़े कर दिए। धौलपुर जिला श्रम कार्यालय ने मामले को लेकर भरतपुर श्रम विभाग को कई बार पत्राचार भी किए मामले की सुनवाई को लेकर याचनाएं भी लगाईं लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा।
अभिभाषक संघों ने भी लिखा समस्या को लेकर पत्र
मामले को लेकर धौलपुर और बाड़ी अभिभाषक संघ ने भी जयपुर श्रम आयुक्तालय को पत्र लिखकर पीडि़त पक्षकारों की समस्याओं से अवगत कराते हुए समस्या का समाधान निकालने को पत्र तक लिखे। धौलपुर संघ के अध्यक्ष हरिओम शर्मा ने बताया कि उन्होंने न्यायालय में बढ़ते ऐसे वादों के जल्द से जल्द निस्तारण को दो बार पत्र लिखकर श्रम विभाग को सूचित किया, लेकिन अभी तक समस्या का हल तो दूर कोई संतुष्टिपूर्ण जवाब तक नहीं मिल सका। समस्या इतनी विकराल है कि राष्ट्रीय लोक अदालतों में भी कोई अधिकारी न होने के कारण दावों का निस्तारण नहीं हो पा रहा।
चोट के प्रकार पर निर्भर करता है मुआवजा
कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम वह कानून है जिसमें काम के दौरान हुई दुर्घटनाओं में कर्मचारियों या उनके परिवारों को वित्तीय सहायता देना। यह पूरे भारत में कारखानों, खानों, बागानों, निर्माण स्थलों, खतरनाक व्यवसायों सहित अन्य पर लागू होता है। यदि कार्यस्थल पर दुर्घटना के कारण मृत्यु या विकलांगता होती है, तो नियोक्ता को मुआवजा देना होगा। यह मुआवजा मासिक वेतन के 50 प्रतिशत से 60 प्रतिशत के बीच हो सकता है, जो चोट के प्रकार पर निर्भर करता है।
केस 1
कचहरी निवासी उस्मान पुत्र इस्लाम ने अपना दावा मई2024 में पेश किया था। जिसमें बताया गया है कि वह मैक्सी ट्रक पर ड्राइवर था। बयाना जाते किसी कार्य से वह नीचे उतरा तभी एक कार ने उन्हें टक्कर मार दी। और वह बुरी तरह घायल हो हादसे में उनको अपना दांया पैर गंवाना पड़ा।
केस २
मालती के पति धौलपुर से बाड़ी मार्ग की निजी बस में कंडक्टर थे। हादसे में उनके पति की मौत हो गई। जिसके बाद उन्होंने 2008 में केस फाइल किया। हालांकि केस का न्यायालय से फैसला हो चुका है, एफडी भी तैयार है, लेकिन भुगतान नहीं हो पा रहा। इनकी बेटी की शादी को है।
केस 3
ग्रीस बिहार कालोनी निवासी सुमित कुमार जिंदल एक फैक्ट्री में कार्य करते थे। कार्य के दौरान वह खुले चैम्बर में गिर पड़े। जिससे वह बुरी तरह घायल हो गए। हादसे में उनको एक पैर गंवाना पड़ा। सुमित ने 2019 में दावा पेश किया था। लेकिन सात साल की लंबी अवधि के बाद आज भी उनके हाथ खाली हैं।
(नोट: यह तो केवल तीन हैं, ऐसे १०० ज्यादा केस लंबित हैं)
जिला श्रम कार्यालय में कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त का दायित्व न होने के कारण कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत आने वाले केस लंबित चल रहे हैं। जिसको लेकर हमने उच्च अधिकारियों को अवगत भी करा चुके हैं।
- अरिवंद कुमार दीक्षित, श्रम कल्याण अधिकारी धौलपुर
Updated on:
20 Apr 2026 06:58 pm
Published on:
20 Apr 2026 06:57 pm
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