
incurable epilepsy disease
मिर्गी के मामले जिस तरह से बढ़ रहे हैं वैसे ही कुछ मामलों में दवाइयां भी बेअसर साबित हो रही हैं। ऐसे में कीटोजेनिक डाइट अनियंत्रित मिर्गी के दौरों में एक वैकल्पिक चिकित्सा है। इस खास डाइट की शुरुआत 1920 में हुई। कई शोध के नतीजों में सामने आया कि इस डाइट से मिर्गी के दौरे के अलावा पार्किंसन, अल्जाइमर, कैंसर रोग और ऑटिज्म के मरीजों को फायदा पहुंचता है। जानते हैं डाइटीशियन से इस खास डाइट और इससे जुड़े फायदों के बारे में...
बच्चों के लिए ज्यादा फायदेमंद -
मिर्गी की तीसरी स्टेज में यह डाइट ज्यादा फायदेमंद है। इसका उद्देश्य दौरों की संख्या व तीव्रता को कम करने और लाइफस्टाइल को बेहतर करना है। कई शोधों के मुताबिक इस डाइट का सबसे ज्यादा व तेजी से फायदा 10 वर्ष से छोटे बच्चों पर देखा गया है।
क्या है कीटोजेनिक डाइट -
इस खास डाइट में अधिक वसा, सामान्य प्रोटीन और कम कार्बोहाइड्रेट लेना होता है। इस कीटोजेनिक डाइट प्लान को तैयार करने के लिए आहार विशेषज्ञ रोगी की उम्र, लंबाई, वजन, शारीरिक संरचना, क्षमता और जरूरत जैसी तमाम बातों को आधार बनाते हैं।
फैट से मिलती है शरीर को एनर्जी -
सामान्य तौर पर शरीर को ऊर्जा देने का कार्य अनाज और शक्कर का होता है लेकिन मिर्गी के रोगियों में ग्लूकोज दिमाग में दौरों की गतिविधि को बढ़ा देता है। इस गतिविधि को कम करने के लिए शरीर को फैट के माध्यम से ऊर्जा दी जाती है।
ये ध्यान रखें -
कीटोजेनिक डाइट को कभी भी विशेषज्ञ की सलाह के बिना न लें।
अधिक फैट के उपयोग के बाद इस डाइट से शरीर का अनावश्यक वजन बढऩे के बजाय नियंत्रित रहता है। ऐसा इसलिए क्योंकि व्यक्ति की उम्र और लंबाई के आधार पर आदर्श वजन की स्थिति बनी रहे इसे भी ध्यान में रखकर डाइट प्लान करते हैं।
चार चरणों में देते हैं डाइट -
मरीज के कुछ अहम चेकअप कराने के बाद परिवार के सदस्यों की उसकी देखरेख को लेकर काउंसलिंग की जाती है।
रोगी के शरीर में शुगर लेवल कंट्रोल करते हैं।
इसके बाद कीटोजेनिक डाइट शुरू की जाती है।
रेगुलर फॉलोअप किया जाता है ताकि किसी भी समस्या की आशंका से मरीज को दूर रखा जा सके।
Published on:
27 Aug 2019 12:25 pm

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