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शिशु का शरीर अत्यधिक लचीला होना भी परेशानी की वजह

जन्म के बाद कुछ समय तक लक्षणों की पहचान नहीं हो पाती। लेकिन उसकी शारीरिक व मानसिक गतिविधियां सामान्य से अलग महसूस हों...

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Pawan Kumar Rana

Nov 04, 2017

Floppy Baby Syndrome

Floppy Baby Syndrome

शिशु के शुरूआती लक्षणों को नोट करने पर उसके विकास के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। अगर शिशु अन्य सामान्य शिशुओं के इतर कुछ क्रियाकलाप नहीं कर पाने में सक्षम हो तो ये चिंता का विषय हो सकता है।

कुछ बच्चों में जन्म या उम्र बढऩे के दौरान हाथ और पैर को कोहनी या घुटने से मोडऩे की क्षमता कम होती है। कमजोर मसल्स से खानेपीने, उठने-बैठने या फिर शरीर के विभिन्न जोड़ से बच्चे का नियंत्रण खोने जैसे लक्षणों से समस्या को आसानी से पहचान सकते हैं। मेडिकली इसे हाइपोटोनिया या फ्लॉपी बेबी सिंड्रोम भी कहते हैं।

लक्षण
उम्र के अनुसार दिक्कतें अलग होती हैं। नवजात शिशु व बच्चों में गर्दन पर कम या न के बराबर नियंत्रण होना, उम्र के अनुसार जमीन पर हाथों व घुटनों के बल न घिसट पाना, खड़े न हो पाना या फिर हाथों से कुछ भी पकड़ न पाना। ज्यादा उम्र वालों को बोलने में दिक्कत, शरीर का सही पोश्चर न होने, शारीरिक ताकत में कमी, हड्डियों के जोड़ में क्षमता से ज्यादा लचीलापन होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

प्रमुख कारण
डाउन सिंड्रोम जैसे आनुवांशिक रोग के अलावा नर्वस या कोई मस्कुलर समस्या की वजह से भी बीमारी हो सकती है। दिमागी रोग जैसे सेरेब्रल पाल्सी, जन्म के समय दिमाग में ऑक्सीजन की कमी आदि भी अहम हैं।

बचाव
जन्म के बाद कुछ समय तक लक्षणों की पहचान नहीं हो पाती। लेकिन उसकी शारीरिक व मानसिक गतिविधियां सामान्य से अलग महसूस हों या शरीर पर उसका नियंत्रण न दिखे तो डॉक्टरी सलाह लें। ऐसे में वह गोद में आते ही फिसलने लगता है। ब्लड टैस्ट, एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी जांचें करते हैं।

ऐसे होता इलाज
शिशु में किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक गड़बड़ी देखने के बाद ही इलाज तय करते हैं। साइकोथैरेपी, फिजियोथैरेपी या स्पीच थैरेपी के अलावा रोग की वजह मेनिनजाइटिस, इंसेफेलाइटिस या अन्य संक्रमण है तो एंटीबायोटिक दवा देते हैं।

- डॉ. सौरभ सिंह, कंसल्टेंट नियोनेटोलॉजिस्ट, महात्मा गांधी अस्पताल, जयपुर


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