अस्थमा (दमा) सांस से जुड़ी बीमारी है। सांस की नली में सूजन या संकुचन होने से मरीज को सांस लेने में तकलीफ होती है। फेफड़ों पर दबाव व सांस फूलने लगती है। खांसी व सीने में जकडऩ के साथ सोते समय घर्र-घर्र की आवाज भी आती है। अस्थमा किसी भी उम्र में हो सकता है।
साल 2019 के लिए विश्व अस्थमा दिवस की थीम एलर्जी एंड अस्थमा है। देश में अस्थमा के 20 प्रतिशत ऐसे मरीज है, जिनकी उम्र 14 वर्ष से कम है।
अस्थमा और एलर्जी में अंतर
अस्थमा भी एक तरह की एलर्जी है लेकिन एलर्जी व अस्थमा में अंतर है। कई दिनों तक जुकाम, खांसी या सांस लेने में दिक्कत की वजह से संक्रमण होता है। शरीर जब बार-बार एलर्जी वाली चीजों के संपर्क में आता है तो अस्थमा का अटैक होता है। इसे एलर्जिक अस्थमा कहते हैं। यदि किसी को सिर्फ एलर्जी है तो उसे तब तक दिक्कत होती है जब तक वह उस चीज के सम्पर्क में रहता है। इससे अस्थमा का खतरा 40 प्रतिशत बढ़ सकता है।
बचेंंगे मुश्किलों से
1- घर में सफाई के समय ठीक से मुंह-नाक ढंक लें।
2- बेडशीट, सोफा कवर, पर्दे की नियमित सफाई करें।
3- तकिया की कवर में एलर्जी के कण होते हैं। सप्ताह में एक बार अवश्य बदलें।
4- कारपेट के प्रयोग से बचें। घर में है तो छह माह में एक बार ड्राइक्लीन कराएं।
5- एसी/कूलर के सामने से तुरंत धूप में न जाएं। न ही ज्यादा ठंड या गर्म खाएं।
6- तय समय पर सोएं, भरपूर नींद लें। तनाव लेने से बचें।
खानपान में बदलाव
- जिन चीजों से तकलीफ बढ़ती हो वे न खाएं।
- एक बार में ज्यादा न खाएं, सीने पर दबाव बढ़ता है।
- रात में सोने से दो घंटे पहले हल्का भोजन करें। १५ मिनट की वॉक करें।
जांचों से पहचान
अस्थमा के लिए फेफड़े या पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, स्किन पैच टेस्ट, ब्लड टेस्ट करते हैं। पीक फ्लो व स्पाइरोमेट्री टेस्ट से फेफड़े की क्षमता व काम की स्थिति की जांच करते हैं। फेफड़ा कितनी सांस भर रहा है व कितनी निकाल रहा है।
अस्थमा के प्रकार
एलर्जिक अस्थमा : घर में धूल, वायु प्रदूषण, घरेलू जानवर, कॉक्रोच से मरीज की तकलीफ बढ़ती है। इससे सांस लेने में तकलीफ, छींक और खांसी आती है।
नॉन एलर्जिक अस्थमा : अधिक तनाव की वजह से सर्दी, खांसी-जुकाम होता है।
ज्यादा व्यायाम से अस्थमा : जिनकी रोग प्रतिरोधकता कमजोर होती है जब वे अधिक व्यायाम व शारीरिक गतिविधि करते हैं उन्हें एक्सरसाइज इनड्यूस अस्थमा होता है।
कामगारों में अस्थमा : नियमित एक तरह के काम के दौरान अस्थमा अटैक पड़ता है।
बच्चों में अस्थमा : चाइल्ड ऑनसेट अस्थमा बच्चों को होता है। उम्र के साथ खत्म हो जाता है। छोटे बच्चों में डर व तनाव से होता है। मानसिक दबाव व तनाव से हार्मोन में गड़बड़ी होने से यह दिक्कत होती है। इससे फेफड़े व श्वास तंत्र की नाडिय़ां सिकुड़ जाती हैं।
ऐसे करें इनहेलर का प्रयोग : अस्थमा पीडि़तों के लिए इनहेलर का प्रयोग ज्यादा कारगर माना जाता है। मरीजों को इनहेलर का प्रयोग करते समय मुंह नहीं खोलना चाहिए, ताकि दवा सीधे फेफड़ों में पहुंच सके। इनहेलर लेते समय मुंह खोलने से दवा गले में ही रह जाती है। सांस की नली में नहीं पहुंच पाती है। इससे मरीज को आराम भी नहीं मिलता है। एक रिसर्च के अनुसार इनहेलर के सही तरीके से न लेने से गले के कैंसर का खतरा बढ़ता है। इसलिए चिकित्सक से इनहेलर के लेने का तरीका व कब तक लेना है इसके बार में परामर्श लेना जरूरी है।
आयुर्वेद में कारगर इलाज : आयुर्वेद में भी मरीजों को भाप के जरिए इनहेलर देते हैं। अशोक की पत्तियों को गर्म पानी में उबालेें। इसके बाद इसकी भाप लें। इसके अलावा विक्स की भाप भी कारगर है। सेंधा नमक की पोटली बनाकर गर्म कर लें। सीने व पीठ के हिस्से पर सिंकाई से आराम मिलता है। तिल के तेल में सेंधा नमक मिलाकर सीने पर भी मसाज करते हैं। गुनगुना पानी लें। इसके अलावा चिकित्सक की परामर्श से बासा अवलेह, बासा कंटकारी काढ़ा बेहद प्रभावकारी है। खानपान में पालक, पपीता, आम, अंडे, दूध, नींबू, टमाटर, संतरा, शकरकंद, बादाम, सूरजमुखी के बीज लेना फायदेमंद है।
- डॉ.नवनीत सूद, सीनियर कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजी, नई दिल्ली
- डॉ. ब्रह्मानंद शर्मा आयुर्वेद विशेषज्ञ, एसआर राजस्थान मेडिकल कॉलेज जोधपुर