
औषधीय पौधे से लहलहाने लगी पहाड़ी
बिना किसी सरकारी मदद के खेती
काश्तकार भगवानदास मीणा ने बिना किसी सरकारी मदद के पहाड़ी क्षेत्र के डेढ़ बीघा में अलग-अलग प्रजातियों के पौधों का रोपण किया। उन्होंने कोविड के दौरान घर के बाहर ही बोरवेल खुदवाया। गैंती-फावड़े से सीढ़ीनुमा क्यारियां तैयार कीं। इनमें विविध औषधीय पौधे रोपे। अहमदाबाद में टाइल्स फिटिंग व घिसाई का कार्य छोड़ उन्हेें अपने गांव में खेती करना अधिक रास आया।
लगाए उपयोगी पौधे
काश्तकर ने कई उपयोगी पौधे लगाए। बबूल का पौधा भूमि में नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। हड्डी में फ्रैक्चर में हडजोड पौधे की पत्तियों को सुखाकर लेप लगाया जाता है। जहरीले सांपों से सुरक्षा के लिए नागफनी का पौधा लगाया। च्यूरा के फूलों से शहद, घी, तेल, साबुन आदि बनता है। दातुन का पौधा दांत के दर्द को दूर करता है। मांगनी के पौधे का उपयोग ढोल-नगाड़ों के साथ बड़े-बड़े जहाजों में किया जाता है। गूगल व सिंदूर के पौधे पूजा सामग्री में उपयोग लिए जाते हैं।
सब्जियों की भी बुवाई
जैविक खाद से सब्जी में भिंडी, टमाटर के साथ अन्य सब्जियों को उगाया है। मीठा व कड़वा नीम, गन्ना, पपीता के पौधे लगाए हैं। सफेद व लाल चंदन की खेती से उन्हें अच्छी आय की उम्मीद है।
समन्वित कृषि पर जोर
वे मुर्गीपालन भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि मक्का, गेंहू व अन्य फसलों के साथ जैविक खेती, सब्जी, मुर्गीपालन के साथ नगदी फसलों को बढ़ावा देने की जरूरत है।
बृजमोहन चौबीसा — साबला
Published on:
10 Aug 2023 06:16 pm
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