
बेणेश्वर : ख्याति तो मिली खूब पर राष्ट्रीय पटल पर पहचान की दरकार
डूंगरपुर. संभाग ही नहीं देश का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल और जनजाति महाकुम्भ स्थल बेणेश्वर धाम beneshwar mela जन-जन की आस्था का केन्द्र है। पर, विश्व विख्यात बेणेश्वर धाम के संरक्षण और संवर्धन को लेकर राजनीतिक एवं प्रशासनिक उपेक्षा का दंश भी यह धाम खूब झेल रहा है। धाम के संरक्षण और संवर्धन के लिए बने मास्टर प्लान कागजों से बाहर नहीं निकल पाए हैं। स्थितियां यह है कि बेणेश्वर मेले को राष्ट्रीय मेले का दर्जा तक नसीब हो पाया है। जबकि, यह मेला प्रदेश ही नहीं देश के विख्यात मेलों की सूची में शामिल हैं।
राष्ट्रीय पटल पर मिलें पहचान
भगवान कृष्ण के अंशावतार संत मावजी महाराज की तपोभूमि बेणेश्वर धाम जन-जन की आस्था का केन्द्र है। हर वर्ष माघ माह की पूर्णिमा को यहां मेला भरता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु आते हैं। पौष पूर्णिमा की महापदयात्रा से ही मेले का माहौल शुरू हो जाता है। मेले के दौरान विशेष रुप से बेणेश्वर स्थित आबुदरा जल संगम में श्रद्धालु दिवंगतों की अस्थियां विसर्जित कर पितरों का तर्पण करते हैं। देश-प्रदेश के बड़े मेलों की तुलना में बेणेश्वर मेला कहीं भी कमत्तर नहीं है। बावजूद इसके पर्यटन विभाग और प्रशासनिक स्तर पर मेले के व्यापक प्रचार-प्रसार और इसे राष्ट्रीय स्वरूप देने की दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। वहीं, मेला आयोजन के दौरान भी वर्षों से चली आ रही समस्याएं नासूर बनकर उभर रही हैं।
2001 से प्रमुख मुद्दा
कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी हो या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। प्रदेश के समय-समय पर आए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत शायद ही कोई ऐसा बड़ा नेता हो, जिसने बेणेश्वर की चौखट नहीं चुमी हो और उनकी यहां सभा नहीं हुई हो। वर्ष 2001 से बेणेश्वर धाम के विकास के लिए समय-समय पर आई सरकार ने घोषणाएं की। पर, यह कागजों से बाहर ही नहीं निकल पाई। गत प्रदेश सरकार ने मास्टर प्लान बनाने की घोषणा की। पर, यह पांच वर्ष तक कागजों में ही घुमता रहा। पूर्व में एक बार सरकार ने बेणेश्वर विकास प्राधिकरण के गठन की भी घोषणा की थी। इसके बावजूद स्थितियां सबके सामने हैं।
फूटी कौड़ी तक नहीं मिलती
बेणेश्वर धाम के वार्षिक मेले के लिए प्रदेश सरकार की ओर से पर्यटन विभाग को बजट मिलता है। यह बजट केवल प्रदेश के अन्य हिस्सों से आने वाले कलाकारों और रंगमंच से बाहर नहीं निकल पाता है। मेला आयोजन के नाम पर मेला कमेटी को फूटी कौड़ी तक नसीब नहीं होती है।
यह हो सकते हैं सुधार
- मास्टर प्लान को धरातल पर अमलीजामा पहनाते हुए उसके अनुरुप ही दुकानें, मनोरंजन आइटम, खेलकूद व सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन स्थल चिन्हित किए जाएं।
- वर्षा ऋतु में 24 घंटे लगातार बारिश रहते ही धाम टापू बन जाता है और धाम पर श्रद्धालु फंस जाते हैं। ऐसे में लम्बे समय से धाम को जोडऩे वाले तीन पुलों सोम, वालाई एवं माही पुलों की ऊंचाई बढ़ाने की मांग की जा रही है। साथ ही पुलों की चौड़ाई बढ़ाने की भी दरकार है।
- मेला बाजार का विस्तार करते हुए बीच में कम से कम 20 से 30 फीट की सड़कें रखी जाएं।
- धाम स्थल पर शुद्ध पेयजल एवं निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए स्थायी और पर्याप्त प्रबंधन किए जाएं।
- आबूदर्रा के समीप पवित्र जल में कपड़े आदि विसर्जन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाएं।
- वाल्मिीकि धाम और त्रिवेणी संगम स्थल जाने के लिए पक्की सड़क बनाई जाएं।
- नदियों में पसरी रहने वाली गंदगी के लिए उचित प्रबंधन किए जाएं।
- सरकार की ओर से मुक्ति धाम घाट, मावजी महाराज का पेनोरमा का कार्य जल्द से जल्द किया जाएं।
- डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा से रोडवेज बस स्टैंशन से बेणेश्वर धाम के लिए नियमित सीधी बस सेवा शुरू की जाए।
Published on:
09 Feb 2020 07:00 am
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