
फिर राजनीति का शिकार हुई गेपसागर झील
फिर राजनीति का शिकार हुई गेपसागर झील
- झील संरक्षण प्रोजेक्ट में हिस्सा राशि देने में राज्य सरकार नहीं दिखा रही रूचि
- कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति बनी बाधक
डूंगरपुर. प्रदेश के सर्वाधिक प्राचीन नगरों में शुमार डूंगरपुर की हृदयस्थली गेपसागर झील को आज तक सरकार का संरक्षण नहीं मिल पाया। झील संरक्षण प्राधिकरण के नाम पर पिछले दो दशक से चल रहा छलावा अब तक जारी है। झील संरक्षण को लेकर केंद्र सरकार के नेशनल प्लान फोर कंवर्जन आफ एक्वेटिक इको सिस्टम के तहत तैयार कराई गई डीपीआर में राज्य सरकार को 40 फीसदी हिस्सा राशि देनी है, लेकिन राजस्थान सरकार इसमें रूचि ही नहीं दिखा रही है। इससे गेपसागर झील के सर्वांगीण विकास के सपना एक बार फिर घुमिल होता नजर आ रहा है।
पहले 10 चुनी, फिर दो के मांगे प्रस्ताव
केंद्र सरकार ने पूर्व में संचालित राष्ट्रीय झील संरक्षण प्राधिकरण को समाप्त कर नए सिरे से झील संरक्षण का प्रोजेक्ट शुरू किया था। इसके तहत राज्य स्तर पर झील संरक्षण अर्थोरिटी का गठन किया गया। वर्ष 2010 में राजस्थान की 10 झीलों को शामिल करते हुए डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कराई गई। इसमें डूंगरपुर की गेपसागर, बांसवाड़ा का डायलाब तालाब, राजसमंद की रामसमंद झील, जोधपुर की कैलाना, जैसलमेर की गाडसिसर, बंूदी की जेटसागर, किशनगढ़ का गुंदवोलाव तालाब, सांभर वेटलैण्ड, उदयपुर की उदयसागर व गोवद्र्धनसागर शामिल थे। डूंगरपुर में नगर निकाय ने झील के लिए प्रोजेक्ट बनाकर भेज दिया। बरसों तक यह लंबित रहा। बाद में नगरपरिषद ने केंद्र और राज्य स्तर पर भागदौड़ की। इसके तहत केंद्र सरकार की ओर से डंूगरपुर की गेपसागर और किशनगढ़ की झील का चयन किया गया। दोनों झीलों के लिए क्रमश: ५५ करोड़ और ५१ करोड़ की डीपीआर बनाने की स्वीकृति मिली। इसमें केंद्र सरकार की ओर से 60 प्रतिशत तथा शेष 40 प्रतिशत राशि राज्य सरकार की ओर से देय थी। डूंगरपुर नगरपरिषद ने नए सिरे से 55 करोड़ की डीपीआर तैयार करके प्रेषित की। हालांकि किशनगढ़ से डीपीआर तैयार ही नहीं हुई। नगरपरिषद डूंगरपुर के सहायक अभियंता विकास लेगा ने बताया कि प्रोजेक्ट को लेकर नई दिल्ली और जयपुर तक प्रयास किए। डीपीआर तैयार की गई। साथ ही लेक आर्थोरिटी से सेंशन भी प्राप्त हो चुकी है।
सरकार बदलते ही फिर जमी धूल
वर्ष 2018 में प्रदेश में सरकार बदल गई। नई सरकार ने पुरानी सरकार के प्रोजेक्ट की समीक्षा की। इसमें झील संरक्षण को लेकर कोई रूचि नहीं दिखाई। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी कोई पैरवी नहीं की। नगरपरिषद स्तर पर पूरजोर प्रयास किए गए, लेकिन वित्त विभाग की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। सरकार ने नगरपरिषद से स्वयं राशि खर्च करने की अपेक्षा की, लेकिन इतनी बड़ी राशि खर्च करने में असमर्थता के चलते इस प्रोजेक्ट पर अब धूल जम रही है।
यह प्रस्तावित किए थे काम
1453.61 लाख की लागत से गेपसागर झील के जलग्रहण क्षेत्र से नाले तैयार करना, घाटी तालाब और खुमाणसागर से पानी गेपसागर तक लाना, खुमाणसागर बांध की मरम्मत
1791.07 लाख की लागत से झील को गहरा कराना तथा ठोस अपशिष्ट को हटाना
205.20 लाख की लागत से झील के पानी शुद्धिकरण के लिए संयंत्र, फ्लोटिंग फव्वारे लगाना
186 लाख की लागत से झील के लिए जरूरी यंत्र मशीनें, नाव आदि खरीदना
25.00 लाख से एक्वाकल्चर
141.99 लाख से कैचमेंट क्षेत्र उपचार कार्यों का संरक्षण
289.22 लाख से झील के फ्रंट साइड के विकास कार्य
608.57 लाख से तट रेखा का सीमांकन और संरक्षण कार्य
48.08 लाख से बादल महल, नाना भाई पार्क और फतेहगढ़ी पार्क का विकास
90 लाख से शौचालय (सुलभ भवन) प्रदान करना
42 लाख रुपए आईईसी गतिविधियां के लिए
09 लाख से ठोस कचरा संग्रहण एवं प्रबंधन
30.51 लाख से झील के ओवरफ्लो क्षेत्र का विकास
90लाख रुपए जेट्टी विकास कार्य
45लाख रुपए जल गुणवत्ता की निगरानी
42 लाख रुपए जैव विविधता विकास पर
नगरपरिषद ने अपने स्तर पर निखारा रूप
भले ही सरकार की ओर से झील संरक्षण को लेकर संबल नहीं मिला, लेकिन डूंगरपुर नगरपरिषद ने पिछले पांच सालों के दरम्यान झील के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए काफी काम कराए। घाटों का पुन:निर्माण, बादल महल विकास, नानाभाई पार्क विकास, बर्डसेंचुरी, रिंगरोड़ के रूप में कई विकास कार्य कराए गए।
दो दशक से चल रहा छलावा
गेपसागर झील के संरक्षण और संवद्र्धन को लेकर पिछले दो दशकों से राजनीतिक दलों के नुमाइंदे छलावा कर रहे हैं। पूर्व में केंद्र सरकार के माध्यम से संचालित राष्ट्रीय झील संरक्षण प्राधिकरण में गेपसागर को शामिल करने के लिए शहरवासियों ने लंबा संघर्ष किया। प्रशासनिक पहल से झील को प्राधिकरण में स्थान मिला, लेकिन कुछ ही सालों में राष्ट्रीय झील प्राधिकरण का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया। इसके बाद राज्य स्तर पर राजस्थान झील (संरक्षण एवं संवद्र्धन) की पहल की। इसमें भी गेपसागर सहित प्रदेश की 10 झीलों को शामिल किया गया। दो-तीन बार विस्तृत कार्ययोजना तैयार कराई गई, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा।
इनका कहना. . .
झील संरक्षण को लेकर डीपीआर भेजी गई थी। केंद्र सरकार की ओर से स्वीकृति मिल गई, लेकिन राज्य सरकार की ओर से हिस्सा राशि उपलब्ध कराने को लेकर अब तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है। यदि सरकार का सहयोग मिल जाता तो गेपसागर झील को प्रदेश ही नहीं पूरे देश के बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करते। हालांकि सरकार से मदद नहीं मिलने के बावजूद नगरपरिषद ने अपनी ओर से कोई कमी नहीं रखी है।
के.के.गुप्ता, सभापति नगरपरिषद डूंगरपुर
Published on:
21 Jun 2020 04:56 pm
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