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पहले प्रति हेक्टेयर मिलता था 15 क्वटल चना, अब मिल रहा 22 क्वींटल

डूंगरपुर. डूंगरपुर के किसान प्रमुख रुप से चने की पैदावर करते है। जिले में रबी की फसल के दौरान करीब 15 हजार हेक्टेयर में इसकी बुवाई होती है और अमूमन जिले में स्थानीय किस्म के चने की फसल से प्रति हेक्टेयर 15 से 18 क्वींटल तक की पैदावर होती है। लेकिन, कृषि विज्ञान केन्द्र फलौज के प्रयासों से अब कई काश्तकार प्रति हेक्टेयर 22 ङ्क्षक्वटल तक फसल ले रहे हैं। इससे इनकी आमदनी बढऩे की राह भी आसान हुई है।

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पहले प्रति हेक्टेयर मिलता था 15 क्वटल चना, अब मिल रहा 22 क्वटल

पहले प्रति हेक्टेयर मिलता था 15 क्वटल चना, अब मिल रहा 22 क्वटल

पहले प्रति हेक्टेयर मिलता था 15 क्वींटल चना, अब मिल रहा 22 क्वटल
कृषि विज्ञान केन्द्र फलोज का प्रयास

डूंगरपुर. डूंगरपुर के किसान प्रमुख रुप से चने की पैदावर करते है। जिले में रबी की फसल के दौरान करीब 15 हजार हेक्टेयर में इसकी बुवाई होती है और अमूमन जिले में स्थानीय किस्म के चने की फसल से प्रति हेक्टेयर 15 से 18 क्वींटल तक की पैदावर होती है। लेकिन, कृषि विज्ञान केन्द्र फलौज के प्रयासों से अब कई काश्तकार प्रति हेक्टेयर 22 क्वींटल तक फसल ले रहे हैं। इससे इनकी आमदनी बढऩे की राह भी आसान हुई है।
परिवर्तन : किसानों ने मानी सलाह
कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा दलहन मिशन परियोजना तहत चना की नवीन किस्म जीएनजी 2144 पर समूह अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन ब्लॉक आसपुर के गांव टाटिया, देवला व गणेशपुर के 30 हेक्टर क्षेत्रफल में 111 किसानों के खेतों पर प्रदर्शन लगाए गए थे। टाटिया गांव में केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी डा. सीएम बलाई के निर्देशन में प्रक्षेत्र दिवस मनाया। केन्द्र के एसोसिएट प्रोफेसर (पौध संरक्षण) डा. बीएल रोत ने चना फसल की वैज्ञानिक खेती पर तकनीकी जानकारी देते हुए समूह अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन की महत्ता के बारे में बताया। यह किस्म सचित क्षेत्रों में देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त हैं। यह किस्म 133 दिनों में पककर औसतन उपज प्रति हेक्टेयर 22.8 ङ्क्षक्वटल तक होती है। दाना मध्यम आकार, डबल फलिया हैं व प्रति फली दो दाने हैं। यह किस्म चना का प्रमुख उखटा रोग (फ्यूजेरियम विल्ट) के प्रति सहनशील है। डा. रोत ने बताया कि इस किस्म में जुड़वा फलियां लगती हैं। किसानों को अपने फीडबैक में चना फली छेदक कीट के प्रबंधन में फैरोमोन ट्रैप के बारे में बताया कि इसे लगाने से फसल पर कीड़े का प्रकोप नहीं हुआ है। संचालन केंद्र के तकनीकी सहायक कैलाशचन्द खराड़ी ने किया।

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