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डूंगरपुर में भारतीय लोकतंत्र चुनौतियां एवं संभावनाएं विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे देश भर से शिक्षाविद् एवं शौधार्थी

डूंगरपुर में भारतीय लोकतंत्र चुनौतियां एवं संभावनाएं विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे देश भर से शिक्षाविद् एवं शौधार्थी, गुरुकुल कॉलेज एवं जीजीटीयू का सांझा आयोजन

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डूंगरपुर में भारतीय लोकतंत्र चुनौतियां एवं संभावनाएं विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे देश भर से शिक्षाविद् एवं शौधार्थी

'भारतीय लोकतंत्र खो रहा है अपनी चमक


डूंगरपुर. डूंगरपुर के इतिहास में शनिवार को एक नया अध्याय जुड़ा। संभवतया यह पहला ऐसा अवसर होगा जब डूंगरपुर को राष्ट्रीय संगोष्ठी की मेजबानी का स्वर्णिम अवसर मिला। एक दो नहीं कई महाविद्यालयों के कुलपतियों की गरिमामयी उपस्थिति में बोरी स्थित गुरुकुल महाविद्यालय में गोविंद गुरु जनजातिय विश्वविद्यालय एवं गुरुकुल पीजी कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी गुरुकुल केम्पस में समारोह पूर्वक शुरू हुई। पहले ही दिन प्रदेश ही नहीं देश भर से शिक्षा एवं लोकतंत्र को सशक्त बनाने में जुटी कई नामी गिरामी सख्सियतों की मौजूदगी में देश भर से आए संकाय सदस्य, शोधार्थी, विद्यार्थियों ने अपने अनुसंधान पत्र का वाचन किया।

जो चुन कर भेजते हैं, उन्हीं को नकार देते हैं
उद्घाटन सत्र में के मुख्य वक्ता वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. नरेश दाधीच विभिन्न विद्धवानों के प्रसंगों को आधार बताते हुए कहा कि समय के साथ-साथ भारतीय प्रजातंत्र अपनी चमक खोता जा रहा है। एक समय था जब 1950 से 60 के दशक तक राजनीतिक दल प्रजातंत्र को सशक्त बनाते थे। लेकिन, इसके बाद से लगातार राजनीतिक दल प्रजातंत्र के मूल को समाप्त करने में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से लग गए। जो जनता राजनीतिक दलों को चुन कर भेजती है। राजनीति दल अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए उसी जनता महत्ती उम्मीदों को सिरे से नकार देती हैं। और जब जनता के अंतर्मन में राजनीतिक दलों के प्रति या कहे लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा खत्म हो जाती है, तब वह विकल्प तलाशना शुरू कर देता है और जो यह परिस्थितियां उत्पन्न होने भी लग गई है। जेहन में यह सवाल उभरने लगता है कि क्या राजनीतिक दलों के बिना भी प्रजातंत्र चलाया जा सकता है। ..और ऐसे सवाल जब उभरते हैं तक लोकतंत्र का अस्तित्व संकट में खड़ा नजर आता है।

...फिर कैसे बने लोकतंत्र सशक्त
अध्यक्षता करते हुए गोविंद गुरु जनजातिय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कैलाश सोडाणी ने कहा कि लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं। इसमें से दो न्यायपालिका एवं कार्यपालिका अत्यधिक सशक्त है। एक बार चुन कर आ गए। फिर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें या नहीं करें 65 साल तक निश्चित होकर सेवा में रहते हैं। लेकिन, भारत में सर्वाधिक सक्रिय स्तम्भ या कहे महत्ती भूमिका निभाने वाले शेष दो स्तम्भ विधायिका एवं मीडिया उतने ही कमजोर है। हर पांच वर्ष में जनप्रतिनिधि को जनता की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। यदि वह जनता की उम्मीदें पुरी नहीं कर पाया, तो तीसरे स्तम्भ से बाहर हो जाता है। जब यह तीनों ही स्तम्भ अपने-अपने कर्तव्यों का बखूबी निर्वहन नहीं करती है, तब जनता का भरोसा मीडिया पर जाता है और वह आजादी के बाद से अब तक काफी हद तक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। लेकिन, यह कहने में गुरेज नहीं कि यह सबसे कमजोर है। खासकर धरातल पर काम करने वाले पत्रकार को देश तीन स्तम्भों के समान या आधी भी सुविधा नहीं दे पा रहा है। जब देश के दो खुंटे विधायिका एवं मीडिया इतने कमजोर होंगे, तो लोकतंत्र सशक्त कैसे बनेगा? संगोष्ठी को जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति एसएस सारंगदेवोत ने कहा कि आजादी के 70 वर्ष बाद भी यदि रोटी, कपड़ा एवं मकान जैसी बुनियादी जरूरते पूरी नहीं हो पा रही है, तो लगता है कि लोकतंत्र का अस्तित्व कमजोर है। स्वागत गुरुकुल महाविद्यालय के निदेशक शरद एम. जोशी एवं सतीश जोशी सहित गुरुकुल स्टॉफ ने किया। संचालन प्रियंका गांधी ने किया। आभार रेखा खराड़ी ने व्यक्त किया। द्वितीय सत्र में प्रो. पीएन पटेल, डा. जयेश शाह एवं प्रो. छाया पटेल ने वार्ता दी।

यह भी बोले खास...
. प्रो. सोडाणी ने कहा कि लोकतंत्र को मतदान मजबूत बनाता है। लेकिन, देश की यह विडम्बना है कि शिक्षित ही मतदान के प्रति रुचि नहीं लेते हैं। महात्मा गांधी एवं शहीद भगत सिंह ने स्व की आहुति देकर हमे मतदान का अधिकार दिया है। लेकिन, हम उसे खुद छोड़ रहे हैं। इससे लोकतंत्र कमजोर होगा।
. पहले राजनीतिक दल कमजोर थे और वह मजबूत जनाधार के व्यक्ति को तलाशते थे और उसको ही चुनाव में टिकट देते थे। लेकिन, अब उल्टा हो गया है। अब राजनीतिक दल मजबूत हो गए हैं और व्यक्ति टिकट लेने जाता है।
. प्रजातंत्र में जनता का उन्हीं के द्वारा चुने गए लोग पर विश्वास नहीं रहा है। यहीं प्रजातंत्र के पतन का कारण बनता है।
. लोकतंत्र को कमजोर करने में इंटरनेट पर फैक पोस्ट एवं काल्पनिक जनमत संग्रह भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

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