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Beneshwar Festival Special : वेण वृक्ष की प्रधानता से बना स्वयंभू शिवलिंग बने बेणेश्वर

बेणेश्वर शिवालय की भी महिमा है अनंत, वर्ष पर्यन्त रहता है भक्तों का तांता

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Beneshwar Festival Special : वेण वृक्ष की प्रधानता से बना स्वयंभू शिवलिंग बने बेणेश्वर

Beneshwar Festival Special : वेण वृक्ष की प्रधानता से बना स्वयंभू शिवलिंग बने बेणेश्वर

डूंगरपुर. प्रदेश के दक्षिणांचल में स्थिज जनजाति बहुल के डूंगरपुर जिले में सोम और माही के संगम स्थल बेणेश्वर धाम पर जन-जन की आस्था का केन्द्र है स्वयं भू शिवलिंग बेणेश्वर शिवालय। बेणेश्वर तीर्थधाम में आने वाला हर श्रद्धालु पवित्र नदियों मेें डुबकी लगाने के बाद बेणेश्वर शिवालय में दर्शन एवं पूजा-अर्चना कर अपने मनोरथ सिद्ध करते हैं। मंदिर को लेकर कहा जाता है कि प्राचीन काल में इस स्थल पर वेण वृक्ष की प्रधानता थी। यहीं पर करीब आधा फूट ऊंचा स्वयंभू शिवलिंग मिला। इसलिए इसका 'बेणेसरÓ नाम पड़ा। यहीं बेणेसर वर्तमान में बेणेश्वर शिवालय और इसके नाम पर ही विविध देवालयों का यह धाम बेणेश्वर धाम के नाम से विख्यात है।

स्कंद पुराण में उल्लेख
वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र उपाध्याय के अनुसार स्कन्द पुराण में उल्लेख आता है कि राजा इन्द्रद्युम्न ने चिरस्थायी कीर्ति के उद्देश्य से महिसागर संगम पर अविचल शिवलिंग की स्थापना की थी। उनकी विशेष भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा था कि जो इस इन्द्रद्युम्नेश्वर ***** की पूजा करेगा वह मेरा गण होगा। इस प्रकार यह महिसागर संगम अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ है। इस संगम में स्नान करके जो मनुष्य इन्द्रद्युम्नेश्वर का पूजन करता है उसका निवास उस धाम में होता है। जहां पार्वती वल्लभ भगवान महेश्वर विराजमान है।

नारदजी ने गाई है महिमा
नारदजी ने अर्जुन को सुनाते हुए कहा है कि इस गुप्त क्षेत्र बेणेश्वर में शंकरजी आराध्य एवं इस उत्तम संगम तीर्थ का पुण्य तुम्हे बताया है। वहीं, कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों में बेणेश्वर तीर्थ पर मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 1605-1637 के बीच डूंगरपुर के महारावल आसकरण द्वारा कराए जाने का उल्लेख भी है। इस शिवालय के जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर माडा के ठाकुर वीरसिंह सोलंकी ने विक्रम संवत् 1826 में इस मंदिर का जीर्णोद्वार कराकर माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को गुरूवार के दिन शिवलिंग, पार्वती, गणपति एवं नन्दी की प्रतिष्ठा भी करवाई थी।

यह जनश्रुति भी है जुड़ी
शिवलिंग के प्रति जनश्रुति हैं कि सदियों पूर्व एक गाय रोजाना स्तनों से यहां दुग्धाभिषेक करती थी। इसकी जानकारी गो पालक को मिली, तो उसने एक दिन झाडिय़ों से छिप यह नजारा देखा। इस पर गोपालक गाय के पास जाने लगा, तो गाय वहां से भागने लगी। इससे गाय का एक पैर शिवलिंग को छू गया तथा शिवलिंग खण्डि़त हो गया। शिवरात्रि पर मंदिर का विशेष शृंगार किया जाता है।

यहां है बेणेश्वर धाम
डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा के जिले से सटा बेणेश्वर धाम डूंगरपुर से करीब 75 किलोमीटर तथा बांसवाड़ा से 40 किमी दूर है तथा आसपुर एवं साबला के सन्निकट है। बेणेश्वर धाम पर प्रकाशित इतिहासकार महेश पुरोहित की पुस्तक 'बेणेश्वरÓ में बताया है कि लेफ्टिनेंट कर्नल ए.एम मैकेजी ने तीन मार्च 1869 को भेजी अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि महीसागर और सोम इन दो नदियों का संगम कहा है। डूंगरपुर राज्य के सन् 1879 के गजेटियर में बेणेश्वर पर सोम और माही नामक दो नदियों का संगम माना है।


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