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राजस्थान का जलियांवाला बाग : रहने को कच्चा मकान और नरेगा मजदूरी के पैसे भी तीन साल से अटके हैं

राजस्थान के जलियांवाला बाग के रूप में पहचान रखने वाले मानगढ नरसंहार के नायक थे गोविंद गुरू

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मृदुल पुरोहित / पंकज शाह

बांसवाड़ा/पीठ. राजस्थान के जलियांवाला बाग नरसंहार के रूप में पहचान रखने वाले बांसवाड़ा के मानगढ में नरसंहार के समय आंदोलन के नायक रहे गोविंद गुरू के वंशज करणगिरी का परिवार आज भी मिट्टी के कवेलूपोश मकान में रहता है। काेरोनाकाल में नरेगा में किए काम की करीब 30 हजार रुपए मजदूरी के लिए परिवार करीब तीन साल से भटक रहा है, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी है। (अंत में वीडियो में सुने परिवार का दर्द)
आर्थिक संबल नहीं मिलने से गोविंद गुरु के वंशज खेती, मजदूरी से भरण-पोषण कर रहे हैं। परिवार गोविंद गुरू के जन्म स्थल डूंगरपुर के बांसिया में उनकी स्मृति में संग्रहालय बनने का सपना देख रहा हैं। तत्कालीन डूंगरपुर कलक्टर आलोक रंजन के समय संग्रहालय के लिए 12 करोड़ रुपए स्वीकृत हुए, लेकिन कार्य शुरू नहीं हुआ।
गोविंद गुरु के वंशज परिवार ने बताया कि गोविंद गुरू की जन्म स्थली बांसिया में राज्य सरकार ने सुविधाएं नहीं दी है। गोविंद गुरु की चौथी पीढ़ी के सदस्य करणगिरी स्वयं परिवार की आर्थिक स्थिति और जागरूकता के अभाव में पढ़ नहीं पाए और उनके बेटे नरेन्द्र बंजारा भी 10वीं तक ही पढ़े हैं।

कौन थे गोविंद गुरु
गोविंद गुरु आमजन को भक्ति से जोड़ने का कार्य करते हुए मानगढ़ धाम पहुंचे थे। गोविंद गुरु के दो पुत्र हरिगर, अमरूगर थे। हरिगर के दो पुत्र मानसिंह व गणपत बांसिया गांव में ही रहे। मानसिंह के पुत्र करणगिरी बांसिया में स्थित धाम को संभाल रहे हैं। वहीं दूसरे पुत्र अमरूगर महाराज के दो पुत्र थे और उनका परिवार बांसवाड़ा जिले में त्रिपुरा सुंदरी के पास कालीभीत गांव में बस गया।

मानगढ़ में जलाई थी क्रांति की लौ

गुजरात-मध्यप्रदेश सीमा से सटा मानगढ़ स्वतंत्रता आंदोलन में सर्वस्व न्यौछावर करने वाले आदिवासियों का शहीदी धाम है। प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को बड़ी संख्या में भक्त यहां स्थापित धूणी, समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। यहां गोविंद गुरु पैनोरमा भी है।

इसलिए हुआ था आंदोलन
डूंगरपुर जिले के बांसिया में बंजारा परिवार में जन्मे गाेविंद गुरु ने आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में कुरीतियां मिटाने के लिए 1890 के दशक में भगत आंदोलन आरंभ किया। इससे पहले लोगों को धर्म से जोड़कर शिक्षा के लिए प्रेरित किया। लोगों को शराब, मांस, व्यभिचार, शराब आदि छोड़ने को प्रेरित करने के लिए सम्प सभा की स्थापना की।

ऐसे हुआ नरसंहार
1903 से मार्गशीर्ष पूर्णिमा को सम्प सभा का वार्षिक मेला भरने लगा। सामाजिक सुधारक गोविंद गुरु अंग्रेजों को खटकने लगे। 17 नवम्बर, 1913 को मानगढ़ में वार्षिक मेला था। उन्होंने अकाल पीड़ित आदिवासियों का लगान कम करने, धार्मिक परम्पराओं का पालन करने देने तथा बेगार से मुक्ति के लिए अंग्रेजी शासन को पत्र लिखा। इसके विपरीत ब्रिटिश अधिकारियों ने मानगढ़ पहाड़ी को घेरकर गोविन्द गुरु को भक्तों सहित पहाड़ी छोड़ने का आदेश दिया। इसी दौरान कर्नल शटन के नेतृत्व में पुलिस ने गोलीबारी आरंभ कर दी। चंद मिनटों में पहाड़ी पर 1500 से अधिक आदिवासी शहीद हो गए और हजारों लोग घायल हुए।

गिरफ्तार हुए थे गोविंद गुरू
अंग्रेज पुलिस ने गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर अहमदाबाद जेल भेज दिया। उन्हें पहले फांसी की सजा सुनाई, लेकिन अच्छे आचरण के कारण फांसी की सजा रोक दी गई। करीब दस वर्ष का कारावास पूर्ण होने के बाद 1923 में जनसेवा से जुड़ गए। 30 अक्तूबर 1931 को गुजरात के कम्बोई गांव में निधन हो गया।

पीएम भी आए पिछले साल
मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की राज्य सरकार की मांग के बीच गत एक नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मानगढ़ धाम पर आए थे।