18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

तो धाक जमा देगा अपना ‘काला बादल’

चावल की विशेष किस्म, केवल क्षेत्र विशेष तक सिमटी

2 min read
Google source verification
photo

तो धाक जमा देगा अपना ‘काला बादल’

डूंगरपुर. चीखली चावल की एक बेहतरीन किस्म, जिसका एक-एक दाना पकने के बाद मोगरे की कलियों की तरह खिलखिला जाता है। स्वाद में लजीज इतना की अच्छे से अच्छे बासमती चावल को धूल चटा दे। इन्हीं विशेषताओं के चलते गृहणियां भी यदि बाजार में कभी यदा-कदा ‘काला बादल’ चावल कहीं दिख जाए, तो उसे खरीदने में तनिक भी देर नहीं करती हैं। पर, जितना अच्छा यह चावल है, उतनी ही अधिक विभागीय उपेक्षा का शिकार भी है। चावल की इस किस्म को काश्तकार हाड़-तोड़ मेहनत कर स्व के बूते ही उपजाकर जिंदा रखे हुए हैं। क्षेत्र विशेष की इस उपज को संरक्षण देकर संवर्धित करने की दिशा में कृषि विभाग कोई खास प्रयास नहीं कर रहा है।
सात-समंदर पार छोड़ी है इस चावल ने छाप
काला बादल चावल की उपज पूरे जिले में नहीं होती है। यह उपज सामान्यत: चौरासी क्षेत्र के चीखली, जसैला, गरियता, बिजौला और नादिया क्षेत्र में होती है। घरों में मेहमान आने के दौरान सामान्यत: लोग आवाभवग में काला बादल ही बनाकर वाहवाही लूटते हैं। स्थितियां यह है कि अब यह चावल प्रदेश सहित खाड़ी देशों में रहने वाले वागड़ के लोगों तक भी बहुतायत पहुंंच रहा है। काश्तकारों का कहना है कि यहां आए अधिकारी स्थानांतरण के बाद भी यह चावल मंगवाते हैं।
प्रति किलो ६० से ८० रुपए
किसान सुन्दरलाल पाटीदार एवं शांतिलाल पाटीदार बताते हैं कि काला बादल धान के दाम 23 से 25 रुपए प्रति किलो तक मिलते हैं। जबकि, धान पिलाने के बाद चावल ६० से ८० रुपए प्रति किलो तक बिकता है। व्यापारी नवनीत पाटीदार ने कहा कि यहां के अनाज व्यापारी किसानों से बड़ी मात्रा में धान खरीदकर चावल का व्यापार करते हैं, जो हाथों-हाथ बिक जाता है।
जून से सितम्बर तक
काला बादल की खेती जिले के जसैला गांव में कई वर्षों से होती आ रही है। धीरे-धीरे यह चावल आसपास के खेतों में भी होने लगा। काश्तकार इसकी बुवाई जून में पहली बारिश से ही शुरू कर देते हैं और सितम्बर तक फसल तैयार होती है। इसके लिए पानी अधिक चाहिए। इसलिए पहले लोग तालाब की पाली पर इसकी खेती करते थे। पहले करीब दस से १२ हेक्टयर में इसकी बुवाई होती थी। पर, समय के साथ-साथ मांग बढऩे पर काश्तकारों ने उपज बढ़ाते हुए २०० हैक्टेयर तक रकबा बढ़ाया है। हर वर्ष इसकी पैदावर में बढ़ोतरी हो रही है। खास बात यह कि किसानों को यह काला बादल सिर पर उठाकर कहीं बेचने जाने की जरूरत नहीं पड़ रही है। आमजन एवं व्यापारी सीधे काश्तकारों के खलिहानों से ही फसल का सौदा कर लेते हैं।


बड़ी खबरें

View All

डूंगरपुर

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग