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गोबर के उपले ऑनलाइन बिकते देखे तो शुरू किया खुद का बिजनेस

वोकल फोर लोकल : वागड़ में होली पर होती है सर्वाधिक गाडूलियों की बिक्री, मार्केङ्क्षटग साइट पर 25 से 30 रुपए प्रति नग गोबर बिक रहे उपले (कण्डे), महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास से शुरू किया उपलों का निर्माण

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शक्ति को सलाम : ऑनलाइन शॉपिंग में देखा बाजार का हाल, स्वरोजगार के लिए उपलों से बढ़ाई चाल

शक्ति को सलाम : ऑनलाइन शॉपिंग में देखा बाजार का हाल, स्वरोजगार के लिए उपलों से बढ़ाई चाल

मिलन शर्मा @ डूंगरपुर. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वोकल फोर लोकल के मंत्र को जेहन में उतार कर आत्मनिर्भर बनने की राह पर डूंगरपुर शहर की कुछ महिलाओं ने अनूठा प्रयास कर रही है। होलिका दहन में सर्वाधिक गाय के (कण्डे) अथवा उपले इस्तेमाल होते हैं। इन्हें वागड़ में स्थानीय भाषा मेें गाडूलियां भी कहा जाता है इनका निर्माण शुरू कर नो प्रॉफिट-नो लॉसपर देना शुरू किया है। महिलाओं का कहना है कि ऑनलाइन शॉङ्क्षपग से जुड़ी सभी एप पर गोबर के कण्डे 25 से 30 रुपए प्रति नग के हिसाब से सेल हो रहे हैं। जबकि, यहां गाय-भैस का गोबर सहजता से उपलब्ध होता है तथा इसकी लागत बहुत कम होती है। ऐसे में त्योहार तथा बाजार की चाल को भापते हुए उन्होंने यह कार्य अपने हाथों लिया। फिलहाल होली त्योहार में एक पखवाड़े से अधिक का समय शेष है। ऐसे में हमारा ध्येय है कि स्थानीय महिलाओं द्वारा बने उपले अधिक से अधिक होलिका स्थल तक पहुंचाएं।

इसीलिए पड़ी जरूरत
मित्र मंडल स्वयं सहायता समूह तथा उन्नति सेवा संस्थान से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि पापड़, अचार-मुरब्बे, कपड़े की थैलियां बनाकर वह आत्मनिर्भर बन रही हैं। पर, अब इस व्यवसाय से बड़ी संख्या मेें घर-घर महिलाएं जुड़ गई हैं। वहीं, हमारी गृहिणियां भी यह रोजमर्रा की दिनचर्या के साथ बना लेती हैं। ऐसे में इनकी सेल डूंगरपुर में इतनी अधिक नहीं है इसी को ध्यान में रख हमने सोशल मार्केङ्क्षटग साइट तथा बाजार से जुड़े लोगों से बात की। इसमें सामने आया कि हमारे यहां सहज उपलब्ध होने वाली वस्तुएं पैङ्क्षकग होकर मार्केङ्क्षटग साइट पर दोगुना से चार गुना अधिक दामों में आ रही हैं। ऐसे में हमारा पूरा ध्यान वागड़ का प्रमुख त्योहार होली पर गया। होली पर सर्वाधिक बिक्री रंगों और होलिका दहन के लिए गाय-भैंस के गोबर से बने उपलों, गाडूलियों का होता है। ऐसे में हमने गाडूलियों और कण्डों का निर्माण शुरू किया है और इसका काफी अच्छा रिस्पॉस देखने को मिल रहा है।

बनी रहे त्योहार की महत्ता, बना रही हर्बल गुलाल भी..
महिलाएं होली त्योहार के मद्देनजर हर्बल गुलाल के पैकेट््स भी तैयार कर रही है। यह केमिकल मिश्रित रंगों से काफी अच्छी गुणवत्ता की है। महिलाएं बनाती है कि चकूंदर से लाल, हल्दी से पीला और पालक से ग्रीन कलर तैयार किया है। हमारा यह प्रोडक्ट 20 रुपए में 100 ग्राम के पैकेट््स बिक्री हो रहा है।

ये भी संभाल रही जिम्मा
समूह के हर नवाचार में प्रेमलता भोई, मीना श्रीमाल, हेमा श्रीमाल, विनिका श्रीमाल, हंसा श्रीमाल, रिद्ददी, बादल, चंद्रकांता, सविता, अस्तुला बाई, सबीब बानू, करिश्मा भोई, करीना प्रजापत, यशोमती चौहान, कोकिला कोटेड, मनीषा अहारी, दिव्या चौहान आदि जुटी हुई हैं।

पर्यावरण को भी पहुंचेगा लाभ
उन्नति सेवा संस्थान की अध्यक्ष नीलम श्रीमाल बताती है कि उपलों का महत्व काफी अधिक है। होलिका दहन, दाह संस्कार अथवा राजस्थान का प्रमुख भोजन बाटी बनाने में भी कण्डों की आवश्यता होती है। ग्रामीण क्षेत्रों मेें तो यह सहज मिल जाता है। पर, शहरी क्षेत्र में पशुपालन खत्म होने से उपले सहज नहीं मिलते हैं। हमने इन उपलों को धार्मिक और पर्यावरण के लिहाज से तैयार करते हुए इसमें देसी नस्ल के गो-वंश के गोबर को गो-शालाओं से एकत्रित किया है। साथ कण्डे बनाने के दौरान कपूर, तिल, गुगल, अश्वगंधा, हवन सामग्री आदि भी शामिल की है। ऐसे में यह धार्मिक लिहाज से तो खरे हैं। साथ ही यह पर्यावरण को भी लाभ पहुंचाएंगे।

महिलाओं को मिला आर्थिक संबलन
मित्र मण्डल स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष उमा श्रीमाल बताती है कि हमारी ओर से बनाई गई गाडूलियां की माला की क्रमश: 25, 40 और 51 रुपए में बिक्री हो रही है और इनकी कीमत प्रति नग एक रुपए से भी कम है। वहीं, बड़ी साइज के कण्डे, जो प्राय: दाह संस्कार एवं बाटियां बनाने में काम में आते हैं यह 10 रुपए प्रति नग बिक रहा है। फिलहाल 40 से अधिक महिलाएं जुड़ी है और उन्हें आर्थिक संबलन मिला है। इनमें कई महिलाएं विधवा, परित्यक्ता तथा निर्धनतम तबके से हैं।