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हमारी ऊंची उड़ान: संस्कृति-परंपराएं देती पैगाम

विश्व आदिवासी दिवस विशेष

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हमारी ऊंची उड़ान: संस्कृति-परंपराएं देती पैगाम

हमारी ऊंची उड़ान: संस्कृति-परंपराएं देती पैगाम

डूंगरपुर . आदिवासियों के मूलभूत अधिकारों की सामाजिक, आर्थिक और न्यायिक सुरक्षा के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। समय के साथ शैक्षिक सहित विभिन्न क्षेत्रों में ऊंची उड़ान भर रहे प्रकृति प्रेमी आदिवासियों की समृद्ध संस्कृति व परंपराएं आज भी नजीर पेश करती है।

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शैक्षिक उड़ान: हर क्षेत्र में मुकाम

जिले का आदिवासी समाज अब धीरे-धीरे हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। शिक्षा के प्रति रुझान कहीं ज्यादा बढ़ा है और अब बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल-कॉलेजों में पढऩे के साथ ही उच्च शिक्षा के लिए बाहर भी जा रहे हैं। वहीं बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर सरकारी नौकरी में उच्च पदों तक भी पहुंच बना रहे है।

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वाद्ययंत्र: हर यंत्र अपने आप में खास

आदिवासियों के रीति रिवाज के साथ वाद्ययंत्र भी खास हैं। यह बात दीगर है कि बदलते दौर में कुछेक वाद्ययंत्र भी लुप्त होते जा रहे हैं, लेकिन लोक मनोरंजन, उत्सव, सुरक्षा और कार्यक्रमों में वाद्ययंत्रों का विशेष प्रयोग आज भी हो रहा है। हर मौके पर अलग-अलग वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है, जिसमें ढोल, तारपी, पावरी, वाहंली, धूम धड़ाका, अलगोजा, टापरा समेत कई यंत्र हैं।

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खेल: तीरंदाजी में सिरमौर

तीरंदाजी में ओलम्पियन और अंतरराष्ट्रीय स्तर के धर्नुधर देने का गौरव दक्षिण राजस्थान के जनजाति अंचल को है। आदिवासी समाज के रग-रग में तीरंदाजी बसी हुई है। सीमित संसाधनों में भी यहां के तीरंदाजों ने विभिन्न स्तरों पर नाम रोशन किया है। विभिन्न स्तरों पर चमकने वाले तीरंदाजों की लंबी सूची है।

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लोकगीत: संस्कृति के संवाहक

क्षेत्र की सभ्यता और संस्कृति को समझना के लिए लोकगीतों को जानना भी जरूरी है। लोकगीत ही संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने की वसीयत हैं। जनजाति लोकगीत अपने आप में अनूठे हैं और उनके गायन की शैली का तो जवाब नहीं। जीवन के प्रत्येक प्रसंग पर लोकगीतों का अपना अलग ही मुकाम है। लोक गीत अपनत्व का एहसास भी कराते है।

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परंपरागत पहनावा, विपदा में सहारा

जनजाति क्षेत्र में चांदी की चमक अलग ही दिखती है। शादी ब्याह में इसकी चमक रहती है। वहीं यह प्रतिष्ठा व संपन्नता का द्योतक भी हैं। विवाह-उत्सव के दौरान चांदी की खरीदारी बहुत अधिक महत्व रखती है। यहां लाड़ी पैरावणी के रूप में गाते-बजाते जौहरी की दुकान पर पहुंच आज भी यह परंपरा निभाई जाती है। समय की बदलती मांग के अनुसार इन चांदी के आभूषणों में थोड़ा बहुत परिवर्तन हुआ तो हैं, लेकिन इसका मूल स्वरूप आज भी वैसा ही हैं। साथ ही यह परंपरागत पहनावे में भी शामिल हैं। विपदा एवं माली हालत खराब होने पर चांदी बैंक का कार्य करती हैं।


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