छत्तीसगढ़ बनने के बाद राज्य की बेटियां और महिलाएं खूब पढ़ीं और आगे बढ़ीं, लेकिन आज भी साक्षरता दर में पुरुषों से पीछे हैं। राज्य में सबसे साक्षर जिला दुर्ग में भी महिलाओं की साक्षरता का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में कम है। पर यहां एक बात चौकाने वाली है कि दस वर्ष में ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत सबसे अधिक 8.6 फीसदी बढ़ा है। जबकि शहरी क्षेत्र की महिलाओं में साक्षरता ग्रोथ का प्रतिशत मात्र 5.98 प्रतिशत रहा।
1988 में साक्षरता अभियान शुरू होने के बाद दुर्ग जिला साक्षरता दर में अविभाजित मध्यप्रदेश में दूसरे स्थान पर था। उस दौरान 1991 से 2001 तक महिलाओं ने हाथ में किताबें थामी। साक्षरता अभियान ने न सिर्फ दुर्ग जिले की महिलाओं को साक्षर किया बल्कि इसकी वजह से बेटियां भी स्कूल की दहलीज तक गईं। फिर भी महिला साक्षरता के मामले में जिले की महिलाएं पीछे रह गईं। सारक्षता अभियान ने महिलाओं के सामाजिक जीवन का स्तर बढ़ाया पर सबकुछ जानने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पाइं।
साक्षरता दर में महिलाएं पुरुषों से पीछे जरूर है, लेकिन अविभाजित दुर्ग जिले में एक अक्षर सैनिक के रूप में अपने कॅरियर की शुरूआत करने वाली शमशाद बेगम ने किताब और कलम के जरिए पद्मश्री सम्मान तक का सफर तय किया। 1990 में पहली बार साक्षरता अभियान से वह अक्षर सैनिक के रूप में जुड़ी और 25 महिलाओं को पढ़ाना शुरू किया। शिक्षा के प्रति उनकी लगन को देख उन्हें गुंडरदेही ब्लॉक में अतिरिक्त संयोजक बना दिया। शमशाद बेगम ने ब्लॉक में 12 हजार 269 निरक्षर महिलाओं को साक्षर किया। इन्हीं महिलाओं को दीदी बैंक से जोडऩे के बाद महिला कंमाडो भी बनाया ताकि वे अपने साथ होने वाले शोषण का सामना भी कर सकें।
2006 में उन्होंने 100 महिलाओं को कमांडो बनाया और आज पूरे बालोद जिले में 8 हजार महिला कमांडो तैयार है। शमशाद बेगम को 2006 में मिनीमाता सम्मान, 2008 में जीजाबाई स्त्री शक्ति सम्मान और 2012 में भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा। शमशाद बेगम का कहना है कि 12 वीं तक की पढ़ाई करने में उन्हें काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। मां ने आठ भाई बहनों को अपने गहने बेचकर पढ़ाया। यही कारण था कि वे इस अभियान से जुड़ गई कि आखिर महिलाओं को भी पढऩे का मौका मिलना चाहिए।
स्कूल में आगे फिर भी पिछड़ी
साक्षरता के मामले में प्रदेश में अव्वल दुर्ग जिले को 1993 में साक्षर जिला घोषित किया गया था। उन दिनों साक्षरता अभियान के प्रोजक्ट डायरेक्टर प्रो. डीएन शर्मा के अनुसार 1992 में ग्रामीण क्षेत्र में 80 प्रतिशत निरक्षर साक्षर हो चुके थे। 1993 में शहरी क्षेत्र के 80 प्रतिशत लोग लिखना-पढऩा सीख चुके थे। इसके बाद साक्षरता अभियान तो बंद कर दिया गया, लेकिन उत्तर साक्षर, नवसाक्षर, स्किल डेवलपेंट, दीदी -भैया बैंक जैसे प्रोजक्ट आए। 1995 से 1998 तक सतत शिक्षा अभियान चलाया गया। गांव-गांव, मोहल्लों में लाइब्रेरी खोल लोगों को पढऩे प्रेरित किया गया था। इस दौरान सबसे ज्यादा इफेक्टिव कला जत्था के प्रोग्राम रहे जिन्होंने शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य, कृषि जैसे क्षेत्रों में जागरूकता लाई।
अक्षर ज्ञान मिला पर रोजगार नहीं
पूर्व सदस्य सचिव राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण एवं पूर्व प्रोजक्ट डायरेक्टर प्रो डीएन शर्मा ने बताया कि साक्षरता अभियान का उद्देश्य केवल अक्षर ज्ञान कतई नहीं था, लोगों ने पढऩा-लिखना तो सीखा पर महिलाएं भी आगे आई पर उन नवसाक्षरों को जागरूक करने और योजनाओं को समझाने की कोई प्लानिंग नहीं हुई। जिसका नतीजा यह हुआ कि विभाग में आए डेढ़ करोड़ रुपए भी वापस चले गए।
पूर्व सचिव जिला साक्षरता समिति दुर्ग रजनी नेलसन ने बताया कि साक्षरता अभियान के तहत जिले में 80 प्रतिशत साक्षरता वाला घोषित कर दिया गया। 2010 में मानव संसाधन विभाग ने साक्षर भारत अभियान चलाया। जिसके तहत 3 करोड़ 63 लाख रुपए भी स्वीकृत हुए थे पर उस क्राइटेरिया में हमारा जिला नहीं आया। अभियान कोई भी हो लगातार चलते रहे तो उसका फायदा मिलता है। साक्षर भारत अभियान जिले में आता तो सेल्फ हेल्प ग्रुप को प्रशिक्षण, के साथ-साथ कई योजनाओं का भी लाभ मिलता। जिससे जिले में महिलाओं की साक्षरता दर तो बढ़ती ही साथ ही वे स्वालंबी भी बन पाती।