
स्वर्णिम चतुर्भुज से टेलिकाॅम सेक्टर तक, अटल जी ने एेसे लिखी भारतीय अर्थव्यवस्था की नर्इ इबारत
नर्इ दिल्ली। वो अक्टूबर 1998 की एक अाम सुबह थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री आैर आज पूरे देशवासियों के आंखों में आंसू छोड़ गए अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को बुलाया था। वाजपेयी ने यशवंत सिन्हा को एक एेसे काम के लिए बुलाया था जिसे उस वक्त 'बिग आइडिया' के नाम से जाना गया। इस एक आइडिया ने विश्व पटल पर भारत की एक नर्इ दास्तां लिख दी। ये वो आइडिया था जिसके जरिए वाजपेयी जी देश को हाइवे नेटवर्क से जोड़ने की बात करने वाले थे।
जब पेट्रोल-डीजल पर सेस लगाकर शुरु हुआ Golden Quadrilateral का काम
24 अक्टूबर 1998 को वाजपेयी जी ने FICCI बैठक में कहा, "ये सरकार देश के अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़ने के लिए 7,000 किलोमीटर लंबी रोड प्रोजेक्ट की शुरुआत करेगी। इस योजना की शुरुआत इसी साल से कर दी जाएगी।" आैर इस प्रकार भारत को 'गोल्डेन क्वाड्रिलेटरल' (स्वर्णिम चतुर्भुज) मिला। उस वक्त प्रधानमंत्री वाजपेयी की अगुवार्इ वाली सरकार द्वारा इस योजना की शुरुआत पर कर्इ चर्चाएं हुर्इं। लोगों ने वाजपेयी के इस फैसले को लेकर मजाक उड़ाया तो कुछ लोगों ने कर्इ सवाल भी खड़े किए। उनका सबसे बड़ा सवाल ये था कि आखिर इस योजना के लिए इतनी बड़ी रकम कहां से आएगी। यही नहीं, इस योजना के लिए भूमि अधिग्रहण समेत कर्इ बड़ी चुनौतियां थी। करीब 54,000 करोड़ रुपए की इस योजना को शुरुआत में पेट्रोल-डीजल पर एक रुपए का सेस लगाकर फंड इकट्ठा किया गया था।
इन फैसलों ने विश्व के लिए पेश की नजीर
भारतीय अर्थव्यवस्था में एक प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी का याेगदान हमेशा ही अनुकरणीय रहा है। 21वीं सदी में भारत को दुनिया के सबसे बड़ी अर्थव्यवथा की कतार में लाकर खड़ा करने के लिए उन्होंने अार्थकि नीति के ढांचे में कर्इ अहम बदलाव किए थे। उन्होंने पीवी नरसिम्हा राव के उसी आर्थिक रास्ते को आैर आगे बढ़ाया जिसने 1991 के बाद अर्थव्यवस्था के मामले में भारत की पूरी तस्वीर बदल कर रख दी थी। टेलिकम्युनिकेशंस, सीविल एविएशन, बैंकिंग, इन्श्योरेंस, पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज, विदेशी व्यापार एंव निवेश, प्रत्यक्ष एंव अप्रत्यक्ष कर, कृषि बाजार, लघु एवं मध्य उद्याेग, अर्बन लैंड सीलिंग्स, हार्इवे, ग्रामीण रोड, प्राथमिक शिक्षा , बंदरगाह, इलेक्ट्रीसिटी, पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें आैर ब्याज दर कुछ एेसे सेक्टर्स जिसके उत्थान ने पूरे विश्व में भारत के आर्थिक कद को बढ़ाया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट से सामाजिक-अार्थिक विकास की आेर
इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर वाजपेयी ने दो महत्वाकांक्षी परियोजनाआें को लाॅन्च किया। इसमें पहली परियोजना गोल्डेन क्वाड्रिलेटरल के जरिए देश के चार महानगरों को जोड़ने के लिए नेशनल हाइवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (NHDP) था। दूसरी परियोजना देश के सभी ग्रामीण इलाकों को जोड़ने को लेकर था जिसका नाम प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PGMSY) थ। इन दोनों परियाेजनाअों ने देश के रियल एस्टेट सेक्टर, काॅमर्स आैर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को क्रांतिकारी रूप से बदल दिया। रोड को लेकर इन परियोजनाआें के बाद भारत को एक के बाद एक कर्इ एेसे वर्ल्ड क्लास हार्इवे मिले जो कि आगे चलकर भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में मददगार रहीं।
इंडस्ट्रियल सेक्टर में सरकारी की कम दखलअंदाजी चाहते थे अटल
वाजपेयी ने हमेशा से ही देश के बिजनेस आैर इंडस्ट्रियल सेक्टर में सरकार की कम से कम दखलअंदाजी चाहते थे आैर उनकी इसी सोच ने आगे चलकर एक विशेष विनिवेश मंत्रालय का गठन किया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण विनिवेश भारत एल्युमिनियम कंपनी (BALCO) आैर हिंदुस्तान जिंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल काॅर्पोरेशन लिमिटेड आैर वीएसएनएल का विनिवेश था। वाजपेयी जी की नेतृत्व वाली सरकार ने एक आैर बड़ा कदम उठाते हुए राजकोषिय घाटे को कम करने के लिए फिस्कल रिसपाॅन्सिबिलीटी एक्ट को लार्इ थी। इससे पब्लिक सेक्टर सेविंग्स को बहुत बड़ी मजबूती मिली। इसी ने वित्त वर्ष 2000-01 के -0.8 फीसदी जीडीपी को बढ़ाकर वित्त वर्ष 2004-05 में 2.3 फीसदी के स्तर पहुंचा दिया था।
टेलिकाॅम सेक्टर में लाए क्रंतिकारी बदलाव
नीति आयोग के पूर्व चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने अपनी किताब में लिखा है कि साल 1999 में वाजपेयी जी की टेलिकाॅम सेक्टर को लेकर लिए गए फैसले ने ही भारतीय टेलिकाॅम सेक्टर की नर्इ इबारत लिखी। 3 मार्च 1999 को वाजपेयी सरकार द्वारा लार्इ गर्इ नर्इ टेलिकाॅम नीति (NTP) ने ही देश में टेलिकाॅम पेनीट्रेशन का बड़े स्तर पर प्रभावी बनाया। अाप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि साल 1999 में देश में जो टेलिकाॅम पेनीट्रेशन 3 फीसदी था वो नाटकीय रूप से बढ़ाकर साल 2012 में 70 फीसदी से भी अधिक कर दिया।
बच्चों की शिक्षा के लिए शुरु किया सर्व शिक्षा अभियान
सर्व शिक्षा अभियान भी वाजपेयी जी का एक आैर चमत्कार था। ये एक एेसी योजना थी जिसने 6 से 14 वर्ष आयुवर्ग के सभी बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा की मुहैया कराने के लिए प्रतिबद्घ था। साल 2001 में इस योजना के लाॅन्च होने के बाद महज चार साल के अंदर ही प्राथमिक स्कलू छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में 60 फीसदी से भी अधिक की गिरावट देखने को मिला।
इस फैसले से हुर्इ थी सबसे बड़ी किरकिरी
हालांकि पोखरण-2 ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का भी दिया। 1998 में इस परीक्षण के पहले अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आैर विश्व बैंक का भारत पर कुल 44 अरब डाॅलर (करीब तीन लाख करोड़ रुपये) का कर्ज था। अमरीका , यूरोपिय संघ समेत कर्इ देशों द्वारा लगाए गए सैंक्शन ने भारत के इंडस्ट्रीयल सेक्टर को गहरा सदमा दिया था। कर्इ पश्चिमी देशों की कंपनियों ने भारत से अपने कारोबार को समेटने तक का फैसला ले लिया था। अमरीका ने भी कड़े शब्दों में भारत को चेतावनी दिया था। लेकिन इन सबके बीच जब साल 2004 में डाॅ मनमोहन सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी जी के बाद देश की बागडोर संभाला जो उस वक्त भारत का जीडीपी 8 फीसदी था। महंगार्इ दर 4 फीसदी से भी कम था अौर एक्सचेंज रिजर्व भी अनुमान से अधिक था।
Updated on:
17 Aug 2018 10:46 am
Published on:
16 Aug 2018 09:09 pm
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