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जीडीपी के साथ पांच साल के निचले स्तर पर कंज्यूमर कांफिडेंस इंडेक्स

सीसीआई सितंबर महीने में 89.4 पर था, जो गिरकर 85.7 अंक पर पहुंचा 2014 के मुकाबले सीसीआई पहुंच चुका है अपने न्यूनतम स्तर पर सीसीआई के घटने का मतलब उपभोक्ताओं में निराशा का भाव होना है

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Consumer Confidence Index at five-year low with GDP

Consumer Confidence Index at five-year low with GDP

नई दिल्ली।जीडीपी ग्रोथ ( GDP growth ) के आंकड़ों में पिटने के बाद अब देश की सरकार को एक और झटका लगा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ( reserve bank of india ) की रिपोर्ट की मानें तो देश के कंज्यूमर के कांफिडेंस में काफी कमी आ चुकी है। आरबीआई ( rbi ) की टर्म के अनुसार कंज्यूमर कांफिडेंस इंडेक्स ( Consumer Confidence Index ) पांच साल के निचले स्तर पर आ गया है। सीसीआई ( CCI ) के घटने का मतलब होता है उपभोक्ताओं में निराशा का भाव होना। आपको बता दें कि हाल ही में दूसरी तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद ( gross domestic production ) के आंकड़े जारी हुए थे जिसमें देश की जीडीपी 4.5 फीसदी पर आ गई थी। वहीं आरबीआई ने मौजूदा वित्त वर्ष में देश की जीडीपी ( GDP ) के 5 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है।

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पांच साल के निचले स्तर पर सीसीआई
भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार कंज्यूमर कांफिडेंस इंडेक्स पांच साल के निचले स्तर पर आ गई है। आंकड़ों के अनुसार नवंबर महीने में सीसीआई 85.7 अंक पर पहुंच गया जबकि सितंबर महीने में यह इंडेक्स 89.4 पर था। रिपोर्ट के अनुसार देश का सीसीआई मजबूत होता है तो इकोनॉमी के लिए उतना ही अच्छा माना जाता है। ऐसे माहौल में सर्विस और गुड्स में ज्यादा इंवेस्ट करते हैं। जिसकी वजह से देश की इकोनॉमी में तेजी देखने को मिलती है।

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सीसीआई कम होना इकोनॉमी के लिए अच्छे संकेत नहीं
वहीं दूसरी ओर जब सीसीआई घटने लगता है तब मार्केट और इकोनॉमी के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। सर्विस और गुड्स सेक्टर में इंवेस्टमेेंट भी कम होने लगता है। मौजूदा समय में इकोनॉमी में क्राइसिस का मुख्य कारण भी इसी को माना जा रहा है। जानकारों की मानें तो मौजूदा समय में मांग में कमी की वजह से आर्थिक सुस्ती छाई हुई है।

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ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट ने भी दिखाया आइना
वहीं दूसरी ओर ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा कर रही है। सीसीआई के गिरने के अलावा बेरोजगारी को भी बड़ी समस्या बताया है। वहीं बैंकिंग क्राइसिस होने की वजह से लोन मिलना भी मुश्किल हो गया है। जिसकी वजह से घरेलू मांग में भारी कमी देखने को मिल रही है। देश की अर्थव्यवस्था में घरेलू मांग का योगदान 60 फीसदी के करीब है। ये सभी फैक्टर हैं जिनकी वजह से विकास दर में गिरावट लगातार देखने को मिल रही है।