
कहीं सेक्स वर्कर्स को नोटा के लिए होना पड़ा मजबूर तो कहीं शौच के लिए नहीं है सुविधा, ऐसी है महिला मजदूरों की हालत
नई दिल्ली। आज से ठीक 132 साल पहले 1 मई 1886 को अमरीका में लाखों मजूदरों ने एक साल हड़ताल किया। इस हड़तल में 11,000 फैक्ट्रियों के करीब 3,80,000 मजदूर शामिल हुए। इस तरह 1 मई को पूरी दुनिया में मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत हुई। हाल ही #MeToo ट्रेंड में था, जिसने राजनीति से लेकर फिल्मी दुनियां की हस्तियों तक को नहीं छोड़ा। आज अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर आपको इससे जुड़ी कई कही-अनकही बातों से रूबरू होने का मौका मिला। इसी मौके पर हम आपको भारत में महिला मजदूरों की हालत के बारे में बताने जा रहे हैं।
240 करोड़ की मंजूरी के बाद भी नहीं मिल रही मनरेगा वर्कर्स को काम
कुछ समय पहले ही भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में से एक नागालैंड की राज्य सरकार ने जिला अधिकारियों को निर्देश दिया है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत श्रमिको को दिए जाने वाले सभी सुविधाओं को बंद कर दिया जाए। जबिक, केंद्र सरकार की तरफ से मनरेगा के लिए 240 करोड़ रुपए नागालैंड सरकार को दिए जा चुके हैं। इस बाबत नागालैंड पब्लिक राइट्स अवेयरनेस एंड एक्शन फोरम ने इस मुद्दे को उठाया भी है। इस फोरम ने सरकार से कहा है कि वो जब तक मनरेगा के तहत सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं, तब तक राज्य सरकार को दूसरे वैकल्पिक माध्यमों से इन लेबर्स को कमाई करने के मौके दिए जाएं।
गार्मेंट फैक्ट्रियों में महिलओं के लिए नहीं मिल रही कोई सुविधा
हाल ही में तमिलनाडु के गार्मेंट वर्कर्स ने मोबाइल रेडियो प्लेटफाॅर्म पर काम करने के लिए घटिया माहौल के बारे में जानकार शिकायत की थी। इस शिकायत के बाद नेशनल ह्युमन राइट्स आयोग ( NHRC ) ने भी संज्ञान लिया है। अब तमिलनाडु की राज्य सरकार पर सभी गार्मेंट फैक्ट्रियों के बारे में जांच पड़ताल कर रही है। एक गार्मेंट फैक्ट्री में तीन रेडियो मोबाइल स्टेशन सेट किए गए हैं जहां वर्कर्स अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इन शिकायतों को गार्मेंट सेक्टर यूनियन को भेजा जाता है। राज्य सरकार में काम कर रहे एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "हमने 400 स्पिनिंग मिल्स और फैक्ट्रियों में नियमों के उल्लंघन के बारे में पता लगाया है। इसके लिए नोटिस भी जारी किया जा चुका है।" उन्होंने आगे कहा कि अधिकतर मामलों में शौच की व्यवस्था ठीक नहीं थी और इनकी साफ-सफाई भी नहीं हो रही थी। इन फैक्ट्रियों में सबसे अधिक महिला कर्मचारी काम करती हैं, लेकिन इसके बावजूद भी यहां शिशु गृह की कोई व्यवस्था नहीं है। हमने इसके लिए मैनेजमेंट को एक महीने का मौका दिया है।
राजनीतिक पार्टियों ने सेक्स वर्कर्स की नहीं मानी मांग
ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स (AINSW) ने सभी राजनीतिक पार्टियों को एक मेनिफेस्टो प्रस्तावित किया थ। इसमें सेक्स वर्कर्स की वेलफेयर की मांग की थी। इनमें सेक्स वर्कर्स को 45 साल की उम्र में पेंशन की सुविधा, पॉलिसी मेकिंग में हस्तक्षेप व उनके सम्मान की बातें शामिल थी। किसी भी राजनीतिक पार्टियों ने इन मुद्दों को अपने मेनिफेस्टो में शामिल ही नहीं किया है। अब इसके बाद इन्हें नोटा ( NOTA ) पर वोट देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा। इनमें कुछ सेक्स वर्कर्स तो वोट ही नहीं दे रही हैं।
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Updated on:
01 May 2019 03:00 pm
Published on:
01 May 2019 02:42 pm
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