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खुलासा: ग्रामीणों पर पड़ी नोटबंदी की तगड़ी मार, मजदूरी में सबसे ज्यादा मंदी

नोटबंदी के दुष्प्रभावों को लेकर एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।

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खुलासा: ग्रामीणों पर पड़ी नोटबंदी की तगड़ी मार, मजदूरी में सबसे ज्यादा मंदी

नई दिल्ली। नवंबर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से की गई नोटबंदी के दुष्प्रभाव धीरे-धीरे सामने आ रहा है। अब एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के ग्रामीण इलाकों में मजदूरी के बढ़ने की दर में नोटबंदी के बाद तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट इतनी अधिक है कि वित्तीय वर्ष 2013-15 के दौरान जहां पारिश्रमिक बढ़ने की दर दो अंकों में थी, वह नोटबंदी के बाद सरकारी सहायता के बावजूद वित्तीय वर्ष 2016-18 के बीच घटकर एक फीसदी से भी नीचे यानी दशमलव में आ गई है। इंडिया रेटिंग की रिपोर्ट के अनुसार, 2013-15 में पारिश्रमिक बढ़ने की दर 11 फीसदी थी जो नोटबंदी के बाद वित्तीय वर्ष 2016-18 में घटकर महज 0.45 फीसदी रह गई। यह सर्वे ग्रामीण इलाकों में कृषि समेत रोजगार के 25 क्षेत्रों में किया गया है।

काम नहीं आए सरकार के प्रयास

शोध के मुताबिक यह गिरावट सरकार की ओर से ग्रामीण मजदूरी बढ़ाने और ग्रामीण रोजगार योजना को सहारा देने के प्रयासों के बावजूद दर्ज की गई है। शोध में पाया गया कि सरकार की ओर से नोटबंदी के बाद न्यूनतम पारिश्रमिक बढ़ाए जाने के इसके एक स्तर से नीचे जाने का खतरा कम हुआ, लेकिन वास्तविक भुगतान में बढ़ोतरी को इससे खास प्रोत्साहन नहीं मिला। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लगातार दो साल 2014-15 और 2015-16 देश को लगभग सूखे की स्थिति का सामना करना पड़ा, जिसकी वजह से किसानों की समस्याएं और बढ़ीं।

सरकार की कोशिशें

नवंबर 2016 में नोटबंदी से पूर्व अगस्त महीने में केंद्र सरकार ने गैर-कृषि मजदूरी में 42 फीसदी की बढ़ोतरी की थी। इससे गैर-कृषि क्षेत्र में नोटबंदी का अधिक नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। इसके अलावा नोटबंदी के बाद इसके नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के बजट में बड़ी बढ़ोतरी की थी।

पशुपालन रोजगार पर भी बुरा प्रभाव

कृषि संबंधी रोजगार के अतिरिक्त पशुपालन से संबंधी रोजगार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। आंकड़ों के मुताबिक पशुपालन रोजगार में पारिश्रमिक बढ़ोतरी की दर वित्त वर्ष 2013-15 में 21.48 से 34.77 फीसदी थी, जो वित्तीय वर्ष 2017-18 में सिर्फ 7 फीसदी रह गई।