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स्टूडेंट्स को तनाव से बचाने को कॉलेजों में बन रहे हैं मेंटल हैल्थ क्लब

जिन छात्रों को कम मानसिक परेशानियां थीं उन्हें निम्न, उससे ज्यादा वालों को मध्यम व सर्वाधिक समस्याग्रस्त को उच्चतम श्रेणी में रखा गया और इन्हें सवाल-जवाब में शामिल किया गया।

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Amanpreet Kaur

Jul 15, 2018

college students

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जिन छात्रों को कम मानसिक परेशानियां थीं उन्हें निम्न, उससे ज्यादा वालों को मध्यम व सर्वाधिक समस्याग्रस्त को उच्चतम श्रेणी में रखा गया और इन्हें सवाल-जवाब में शामिल किया गया।

स्टूडेंट्स में मानसिक तनाव की समस्या दुनियाभर में है और हर जगह अपने-अपने ढंग से इसका हल ढूंढा जा रहा है। अमरीकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार 1990 के बाद से अमरीकी छात्र-छात्राओं में मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं। कुछ सालों में अमरीकी कॉलेजों व यूनिवर्सिटी कैम्पस में छात्रों की हिंसक घटनाओं की कड़ी भी इसी समस्या से जोडक़र देखी गई। अब इन मानसिक परेशानियों से निपटने के लिए खुद छात्र ही आगे आए हैं। शिक्षण संस्थानों में स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी से विस्तार होने पर अब छात्र-छात्राएं अपने साथियों द्वारा संचालित मेंटल हैल्थ क्लब और संगठनों से संपर्क कर रहे हैं। अध्ययन में सामने आया कि छात्रों की इस नई पहल को गजब का रेस्पॉन्स मिल रहा है और परिणाम उत्साह बढ़ाने वाले हैं।

अपनी तरह के इस पहले अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि कैलीफोर्निया के बारह कॉलेजों के छात्र-छात्राएं इस तरह के प्रयास में शामिल हैं और मानसिक रूप से परेशान युवाओं की समस्याओं में मदद कर उन्हें सामान्य बना रहे हैं। इस पहल पर रैंड कॉर्पोरेशन के एक वरिष्ठ चिकित्सक और नीति शोधकर्ता ने कहा कि छात्रों द्वारा संचालित इन गतिविधियों से मानसिक परेशानियों से जूझ रहे स्टूडेंट्स को काफी राहत मिल सकेगी। साथ ही ये कैंपस के माहौल को भी बदलने में अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं। उनके मुताबिक कॉलेज छात्रों में इस समस्या पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया है जबकि यह एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है।

हाल ही यह अध्ययन अमरीकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकिएस्ट्री के जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन एक ऑनलाइन सर्वेक्षण पर आधारित था जिसमें मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों की जागरुकता और एक्टिव माइंड्स (संस्था) के संबंध में उनके ज्ञान के बारे में प्रश्न पूछे गए थे। इस संबंध में राष्ट्रीय संगठनों ने भी कॉलेज परिसरों में छात्र संचालित इन मानसिक स्वास्थ्य क्लबों का समर्थन किया है। कॉलेज में पॉजिटिव प्रतिक्रिया मिलने पर अब इन छात्रों ने हाल ही हाइस्कूल स्तर पर भी काम करना शुरू कर दिया है। इस मुहिम के तहत छात्रों ने अपने 450 से अधिक समूहों की लगभग 50 हाईस्कूल यूनिट्स शुरू की हैं।

इस सर्वेक्षण को 2016-17 के शैक्षणिक सत्र के दौरान करीब तीन बार आयोजित किया गया। इन सर्वे में छात्रों से उनकी मानसिक समस्याओं के बारे में जानकारी, मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों के बारे में उनके नजरिए के अलावा उनके या उनके किसी परिचित के ऐसी किसी परेशानी से ग्रसित होने पर अनुभव के बारे में पूछा गया। इन सर्वेक्षणों में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और कॉलेज के करीब 1100 छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया था।

सर्वेक्षण में मिले जवाबों के आधार पर शोधकर्ताओं ने यवुाओं की मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों और एक्टिव माइंड्स के बारे में उनके नजरिए को वर्गीकृत करते हुए उन्हें निम्न, मध्यम और उच्चतम भागीदारी के रूप में प्रतिक्रिया देने वाले छात्रों के रूप में चिन्हित किया। इसमें 63 प्रतिशत निम्न, 30 प्रतिशत मध्यम और 7 फीसदी उच्चतम भागीदारी वाले युवा थे।

शैक्षणिक सत्र के खत्म होते-होते निम्न और मध्यम वर्ग के छात्रों के समूहों के नतीजों में सामने आया कि इन युवाओं का एक्टिव माइंड्स (संस्था) के बारे में न केवल अनुभव और ज्ञान बढ़ा था बल्कि इस दौरान ऐसी मानसिक रूप से विकृत गतिविधियों में भी कमी देखने को मिली। साथ ही यह भी सामने आया कि अब ये युवा गंभीर रूप से ऐसी परेशानियों से जूझ रहे किसी अन्य छात्र की मदद करने में भी सक्षम हैं। अपने साथियों द्वारा चलाए जा रहे इन मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए कैंपस के माहौल को सकारात्मक रूप से बदलने की संभावना में भी विस्तार हुआ था। साथ ही ऐसी परेशानियों से जूझ रहे युवाओं को आवश्यक मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध करवा सकते हैं।
एक्टिव माइंड्स नाम की संस्था की स्थापना 2003 में एलिसन माल्मन ने अपने बड़े भाई की आत्महत्या के बाद की थी। युवा छात्र-छात्राओं के मेंटल हैल्थ क्लब पर हुए अध्ययन के निष्कर्षों ने एलिसन का मनोबल बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर छात्रों से उनके स्तर पर चर्चा कर उनके नजरिए में कमाल के बदलाव लाए जा सकते हैं। इसे साबित करने के लिए अब आंकड़े भी मौजूद हैं।
क्लब वास्तव में इस समस्या को बड़े ही अलग अंदाज से दूर करने का रास्ता सुझाते हैं। (रिपोर्ट : एमी एलिस नट, पुलित्जर पुरस्कार विजेता)