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मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी का शोध : लड़के व लड़कियां अलग-अलग तरीके से होते हैं हैक

एक नए शोध में पता चला है कि कम आत्म-नियंत्रण वाले बच्चे या मौका पाने के दौरान खुद को पेश करने की क्षमता न रखने वाले बच्चों में हैक होने की संभावना अधिक रहती है। लड़कियों और लड़कों के हैकिंग के तरीके काफी अलग हो सकते हैं।

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Hacking

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एक नए शोध में पता चला है कि कम आत्म-नियंत्रण वाले बच्चे या मौका पाने के दौरान खुद को पेश करने की क्षमता न रखने वाले बच्चों में हैक होने की संभावना अधिक रहती है। लड़कियों और लड़कों के हैकिंग के तरीके काफी अलग हो सकते हैं। अमरीका के मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रमुख अध्ययन लेखक और साइबर क्राइम विशेषज्ञ थॉमस होल्ट ने कहा, लड़कियों के लिए हमउम्र की मित्रता अधिक मायने रखती है। यदि उसके पास ऐसे दोस्त हैं जो छोटे अपराधों में संलिप्त हैं, तो ऐसे में उसके हैक होने की संभावना अधिक होती है।

होल्ट ने कहा, हमने पाया कि लड़कों के लिए टीवी देखने या कंप्यूटर गेम खेलने में बिताया गया समय हैकिंग से जुड़ा था। हैकिंग की संभावना को जानने के लिए होल्ट ने दुनियाभर के 50,000 किशोर-किशोरियों की प्रतिक्रियाओं का आकलन किया। उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ निष्कर्षों से पता चलता है कि किस तरह बच्चे अपनी लिंगगत भूमिकाओं के अंतगर्त आगे बढ़ते हैं, जैसे कि लड़कों को वीडियो गेम खेलना और लड़कियों को अलग-अलग गतिविधियां पसंद हैं।

हैक होने के लिए लड़के-लड़कियों के व्यवहार में कुछ बातें काफी मायने रखते हैं। इनमें उनका अपना कमरा, अपना कंप्यूटर और अभिभावकों के मार्गदर्शन के बिना इंटरनेट पर उनके मनचाहे अनुसार कुछ भी करने की आजादी शामिल है। वहीं कई स्कूलों में भी कंप्यूटर और इंटरनेट Access उपलब्ध होते हैं। हालांकि होल्ट ने विस्तारपूर्वक बताया कि बच्चे साइबर अपराध में शामिल न हों, इसे ध्यान में रखते हुए कुछ भौगोलिक अवरोधक भी होते हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन बच्चों को जल्द ही मोबाइल फोन दे दिया जाता है, उनके हैक होने की संभावना ज्यादा होती है, और खासकर अगर वे बड़े शहर में रहते हों तो और भी। क्राइम एंड डेलीक्वेंसी पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में यह भी कहा गया है कि छोटे शहरों में आपराधिक प्रवृतियों वाले साथियों के साथ समय बिताने से भी किशोरों पर उनका प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने पाइरेटेड फिल्म, Music और हैकिंग के बीच भी संबंध पाया है। ऐसे में यह अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चे के टेक्नोलॉजी के प्रति झुकाव का समय-समय पर विश्लेषण करते रहें, ताकि वे उन्हें सही मार्गदर्शन दे सकें।