14 जून 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Uttar Pradesh assembly elections 2022: जानें कितनी कामयाब होगी सपा की सोशल इंजीनियरिंग

पिछले 2007 के चुनाव से यूपी में विभिन्न पार्टियों ने सोशल इंजीनिरिंग का नया नुस्खा निकाला है। पहली बार इसी फार्मूले पर बसपा ने फतह हासिल की तो उसी राह पर चल कर 2012 में सपा सत्ता के सिंघासन पर काबिज हुई। लगभग वही फार्मूला 2017 में भाजपा ने अपनाया था। अब Uttar Pradesh assembly elections 2022 में समाजवादी पार्टी ने भाजपा को मात देने के लिए फिर से सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर काम कर रही है। देखना होगा कि सपा अपने इस मुहिम में कितनी सफल होती है।

4 min read
Google source verification
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव

वाराणसी.Uttar Pradesh Assembly elections 2022 की घंटी लगभग बज चुकी है। सभी पार्टियां अपने-अपने ढंग से गुणा-गणित में जुट गई हैं। कुछ ने अपनी रणनीति बना ली है तो कुछ अंतिम दौर में हैं। लेकिन लगभग सारी पार्टियों ने यूपी के सत्ता सिंहासन पर काबिज होने के लिए मायावती के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को अख्तियार कर लिया है जिसकी बदौलत मायावती ने प्रचंड बहुमत के साथ यूपी में सरकार बनाई थी। इस कड़ी में बसपा के साथ भाजपा और सपा भी उसी राह पर है। कारण भी साफ है जिस फार्मूले पर मायावती ने फतह हासिल की थी उसी पर चल कर सपा और 2017 में भाजपा ने सत्ता सिंहासन पर कब्जा जमाया था। तो जानते हैं इस बार किसकी सोशल इंजीनियरिंग कितना दम दिख रहा है...

बसपा की सोशल इंजीनियरिंग में थे दलित, ब्राह्मण व ओबीसी

बसपा प्रमुख मायवती और उनके खास सिपहसालार सतीश चंद्र मिश्र ने पहली बार सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला दिया और वो इसमें सफल भी हुए। प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई। हालांकि पांच साल बाद उसी फार्मूले को समाजवादी पार्टी ने लागू किया और उसके लिए भी ये फार्मूला जीत का आधार बना। फिर उसी पत्ते को 2017 में भाजपा ने चला और वो भी मकसद में सफल रही।

अब सपा फिर से उसी सोशल इंजीनियरिंग का बुन रही है खाका

समाजवादी पार्टी 2022 चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत ही अलग-अलग जातियों को साधने में जुटी है। अखिलेश यादव जातीय आधार वाले दलों के साथ गठबंधन करने के साथ ही क्षेत्रीय जाति आधारित क्षत्रपों को विपक्षी दलों से तोड़ कर अपने साथ मिलाने में जुटे हैं। इसके तहत ही अखिलेश ने राजभर, ब्राह्मण, जाट, कुर्मी, मौर्या-कुशवाहा नोनिया चौहान और पासी समुदाय के वोट बैंक को अपने पाले में करने की रणनीति अख्तियार की है।

पूर्वाचंल को साधने के लिए राजभर

पूर्वांचल में राजभर मतदाताओं की तादाद करीब 12 से 22 फीसद है। ये किसी भी दल का सियासी समीकरण बनाने और बिगाड़ने की कूबत रखते हैं। पूर्वांचल के गाजीपुर, चंदौली, मऊ, बलिया, देवरिया, आजमगढ़, लालगंज, अंबेडकरनगर, मछलीशहर, जौनपुर, वाराणसी, मिर्जापुर और भदोही में इनकी अच्छी खासी आबादी है। ऐसे में ये सूबे की करीब चार दर्जन विधानसभा सीटों पर अपना खास असर रखते हैं। इन्हें अखिलेश यादव ने सबसे पहले गठबंधन में शामिल किया। साथ ही अखिलेश ने दूसरे दलों के प्रभावशाली राजभर नेताओं को भी जोड़ लिया है। इसमें रामअचल राजभर और सुखदेव राजभर के बेटे प्रमुख हैं। पूर्वांचल में सपा की हर रैली में मंच पर अखिलेश के साथ राजभर नेता नजर आ रहे हैं। अखिलेश इस कार्ड के जरिए राजभर वोट को अपने पाले में लाने की चाल चली है।

2017 में ये राजभर बीजेपी संग रहे
बता दें कि 2017 में ये राजभर अपने नेता ओपी राजभर की अगुवाई में बीजेपी के साथ थे। नतीजा साफ, दोनों ही सफल रहे। प्रदेश की लगभग 22 सीटों पर बीजीपी की जीत में राजभर वोटबैंक ने अहम भूमिका निभाई। वहीं चार सीटों पर ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा को जीत हासिल हुई। आंकड़ों पर नजर डालें तो राजभर समाज का 80 फीसद से ज्यादा वोट भाजपा-सुभासपा गठबंधन को मिला, जबकि सपा को महज 5 फीसद।

कुर्मी वोटों पर भी सेंधमारी की कोशिश

यूपी में जातीय समीकरण पर नजर डालें तो यादव के बाद पिछड़ों में सबसे बड़ा कुर्मी समुदाय है। यूं तो सूबे में कुर्मी वोटर महज छह फीसद है। लेकिन पूर्वाचंल के 16 जिलों में कुर्मी और पटेल वोट बैंक की तादाद छह से 12 फीसद से भी अधिक है। इनमें मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और बस्ती जिले प्रमुख हैं। राजनीतिक पंडितों की मानें तो यूपी की चार दर्जन विधानसभा सीटों पर कुर्मी वोटर किसी को जिताने की कूबत रखते हैं।

2017 से कुर्मियों का बड़ा धड़ा बीजेपी के साथ है
2017 के विधानसभा चुनाव से अब तक कुर्मियों का बड़ा धड़ा अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व में बीजेपी के साथ है। ऐसे में इन कुर्मी वोटरों ने पिछले चुनाव में बीजेपी को लाभ पहुंचाया। अब कुर्मी वोटों की सियासी हैसियत के मद्देनजर ही सपा ने केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की मां और अपना दल के जनक डॉ सोनेलाल की पत्नी कृष्णा पटेल की पार्टी संग गठबंधन किया है। साथ ही सपा नरेल उत्तम के रूप में पहले से ही पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाए है। वो भीकुर्मी समुदाय से ही हैं। साथ ही कुर्मी नेता लालजी वर्मा, बालकुमार पटेल सहित कई बड़े कुर्मा नेताओं को भी साइकिल की सवारी करा दी है।

नोनिया और चौहान समाज

अन्य पिछड़ा वर्ग में नोनिया और चौहान भी है। भले ही ये सिर्फ एक से डेढ़ फीसदी है, लेकिन पूर्वांचल की 10 से ज्यादा सीटों पर प्रभाव रखते हैं। पूर्वांचल के मऊ जिले की सभी सीटों पर नोनिया समाज के 50 हजार से अधिक मतदाता हैं। वहीं गाजीपुर के जखनियां में करीब 70 हजार तथा बलिया, देवरिया, कुशीनगर, आजमगढ़, महराजगंज, चंदौली और बहराइच में भी इनका दबदबा है। हालांकि नोनिया समाज कभी बसपा का वोट बैंक हुआ करता था, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने फागू चौहान को साथ लेकर नोनिया समाज के 90 फीसदी वोट हासिल किए था। अब सपा ने नोनिया वोटों को साधने के लिए संजय चौहान की जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के साथ भी गठबंधन कर लिया है।

ब्राह्मण वोट बैंक के लिए जतन

यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोटर किंगमेकर की भूमिका में है। वैसे ब्राह्मण समाज को बीजेपी का हार्डकोर वोटर माना जाता रहा है। सीएसडीएस के अनुसार 2017 के विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण समुदाय का 80 फीसद वोट बीजेपी को मिला था जबकि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में 72 और 82 फीसदी ब्राह्मणों ने बीजेपी को वोट दिया था। लेकिन 2022 के चुनाव में ब्राह्मणों को साधने के लिए अखिलेश यादव भी जोर लगाए हैं। भगवान परशुराम की मूर्ति लगाने से लेकर ब्राह्मण समुदाय के मजबूत नेताओं को पार्टी में शामिल करने में जुटे हैं। कारण साफ है, सूबे की 403 में से 77 सीटों पर ब्राह्मण वोटर निर्णायक भूमिका में है। यही वजह है कि सपा इस बार ठाकुर से ज्यादा ब्राह्मण कैंडिडेट उतारने के मूड में है। पार्टी के रणनीतिकारों की कोशिश है कि यूपी चुनाव को ठाकुर बनाम ब्राह्मण कर दिया जाए।

मौर्य शाक्य सैनी व कुशवाहा पर नजर

सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के तहत अखिलेश यादव ने केशव देव मौर्य की पार्टी महान दल के साथ गठबंधन किया है। साथ ही बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे आरएस कुशवाहा को भी साइकिल की सवारी करा दी है। इनके जरिए सपा ने साफ संकेत दिया है कि वो मौर्या-शाक्य-सैनी और कुशवाहा वोट बैंक पर भी काग दृष्टि लगाए हैं। बता दें कि इससे पूर्व 2017 में

बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्य को आगे किया था। साथ ही स्वामी प्रसाद मौर्य को जोड़कर यूपी में मौर्या-शाक्य-सैनी और कुशवाहा जाति के 90 फीसदी वोटों को हासिल किया था।