चुनाव

MP Election 2023: सियासत में निर्दलीय लड़कर की एंट्री, फिर सीएम पद तक पहुंच गए यह नेता

2018 के चुनाव में 4 निर्दलीय जीते, सभी को बड़ी पार्टियों से टिकट, इस बार करीब 2500 मैदान में

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Nov 02, 2023

जितेंद्र चौरसिया

यूं तो मध्यप्रदेश में हमेशा से सत्‍ता की जंग भाजपा और कांग्रेस के बीच रही है, लेकिन चंद ऐसे भी रहे जिनकी एंट्री तो निर्दलीय रही, लेकिन बाद में सियासत के शहंशाह बन गए। प्रदेश में दो तो ऐसे नेता रहे, जिनकी सियासी पारी निर्दलीय विधायक से हुई, बाद में प्रदेश के मुख्‍यमंत्री तक बने। ऐसे दो नाम हैं अर्जुन सिंह और बाबूलाल गौर।


पिछले 2018 के चुनाव में जब सत्‍ता तक पहुंचने के लिए चंद सीटों का गणित उलझा, तब भी निर्दलीय 4 विधायकों का दम नजर आया। कांग्रेस को एक निर्दलीय को मंत्री बनाना पड़ा।

2023 का मध्यप्रदेश का महामुकाबला शुरू हो गया। भाजपा-कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बीच निर्दलीय भी मैदान में उतर गए हैं। कोई शुरुआत कर रहा है, तो कोई बागी होकर लड़ रहा है। ये भी खास है कि भाजपा-कांग्रेस भले ही आधे- एक फीसदी वोट शेयर के लिए दिनरात एक कर दें, पर 5 फीसदी से ज्यादा वोट तो निर्दलीय ही ले जाते हैं। यानी कई सीटों पर बाजी पलटने का माद्दा रखते हैं। कई ऐसी सीटें हैं, जिनकी जीत-हार निर्दलीय बदल देते हैं। इस बार भी 230 सीटों पर करीब 2800 निर्दलीय हैं। अब तक सबसे ज्यादा 39 निर्दलीय 1962 में जीते थे। इस बार या ये जनता के लिए विकल्प होंगे यह भविष्य के गर्त में है।

ये भी दिलचस्प : 2018 के 4 पहली बार वाले निर्दलीय अब पार्टियों में

- सुरेंद्र सिंह शेरा - बुरहानपुर सीट से पहली बार के निर्दलीय विधायक हैं। पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस को हराकर विधायक बने थे। कमलनाथ सरकार को समर्थन दिया था। अब कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं।

- केदार डाबर - भगवानपुरा सीट से पहली बार के विधायक हैं। इस बार कांग्रेस के टिकट पर प्रत्याशी हैं। 2018 में कांग्रेस प्रत्याशी विजय सिंह महज 20112 वोट पाकर तीसरे नंबर पर थे। केदार को 73758 वोट मिले थे।

- प्रदीप जायसवाल - 2018 में निर्दलीय जीते थे। पहले कमलनाथ सरकार को समर्थन दिया, मंत्री बने। फिर भाजपा को समर्थन दिया। चार बार के विधायक हैं। अभी 2020 से खनिज निगम के अध्यक्ष हैं। हाल ही में भाजपा में शामिल होकर अब प्रत्याशी हैं।

- विक्रम सिंह राणा - सुसनेर से पहली बार के निर्दलीय विधायक हैं। अब भाजपा में शामिल हो प्रत्याशी हैं। पिछली बार भाजपा प्रत्याशी मुरलीधर पाटीदार 43880 वोट पाकर तीसरे नंबर पर थे। विक्रम को 75804 वोट मिले थे।


ये दो सीएम, जो निर्दलीय से हुए शुरू

बाबूलाल गौर - मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम रह चुके बाबूलाल गौर ने राजनीति की शुरुआत भोपाल दक्षिण-पश्‍चिम से 1974 में निर्दलीय उपचुनाव जीतकर की। गौर जीते, फिर गोविंदपुरा सीट पर आ गए। बाद में गोविंदपुरा को भाजपा का गढ़ बना दिया। गौर 2004 में सीएम बने थे।

अर्जुन सिंह - मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम रहेअर्जुन सिंह ने भी सियासत की शुरुआत 1957 में विंध्य के मझौली क्षेत्र से की थी। तब, तब यहां पर कांग्रेस से मुनिप्रसाद शुक्‍ला थे। अर्जुन जीते थे। बाद में कांग्रेस में गए। अर्जुन सिंह 9 जून 1980 में सीएम बने थे। वे तीन बार मप्र के सीएम बने।

इस बार ये निर्दलीय बनकर कूदे मैदान में, दो विधायक भी दावेदार

भाजपा से बागी होकर सीधी सीट पर केदार शुक्‍ला, बुरहानपुर सीट पर हर्ष सिंह, दमोह से मोंटी रायकवार, मनगंवा से मन्नुबाई प्रजापति व मनावर से पूर्व मंत्री रंजना बघेल, बड़वारा से पूर्व मंत्री मोती कश्यप और कांग्रेस से बागी होकर भोपाल उत्‍तर सीट पर नासिर इस्लाम, महू से अंतर सिंह दरबार व गोटेगांव से शेखर चौधरी चुनावी मैदान में उतरे हैं। इनके सहित हर्ष सिंह रंजना बघेल और भी कई निर्दलीय मैदान में हैं।

2018 में 5.82% मिले थे वोट

सिर्फ 0.1 फीसदी वोट शेयर का अंतर 2018 में भाजपा और कांग्रेस में 0.1 फीसदी वोट शेयर का अंतर था, जबकि निर्दलीय 5.82 फीसदी वोट ले गए। भाजपा को 41.0 फीसदी और कांग्रेस को 40.9 फीसदी वोट मिले। यह अंतर 1990 में 12.90 प्रतिशत था।





























































चुनावी वर्षनिर्दलीय प्रत्याशीजीतेवोटवोट प्रतिशत

1990


273010244747512.48

1993


18140813928326.17
19988920917225987.03
20038790219644428.06
200813980320764538.51
201310900318202515.74
201810940422182305.82

39 सबसे ज्यादा

1967 में जीते 22 ऐसा नहीं है कि निर्दलीय विधायक हमेशा ही कम रहे हैं। 19६2 में सबसे ज्यादा 39 निर्दलीय जीते थे। तब, 374 निर्दलीय चुनाव में उतरे थे। 1967 में 22 निर्दलीय विधायक जीते थे। वैसे 22 विधायकों का आंकड़ा वो है, जिससे मार्च 2020 में सत्‍ता परिवर्तन हो गया। ये आंकड़ा वो है, जो पिछले मार्च 2020 में सत्‍ता परिवर्तन का कारण बना था।

किन्नर की जीत

रिकॉर्ड 40.08 प्रतिशत वोट भाजपा-कांग्रेस को धराशायी करके निर्दलीय जीत का इतिहास सोहागपुर सीट से ऐसा भी है, जब किन्नर शबनम मौसी विधायक बनी थी। वे वर्ष-2000 के उपचुनाव में निर्दलीय होकर रिकार्ड 40.08 फीसदी वोट से जीती। इस जीत ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। शबनम पहली किन्नर विधायक बनी। हालांकि बाद में किन्नर मौसी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में हार गईं।

ये दिग्गज भी निर्दलीय रहे

संजय शाह : पहला चुनाव 2008 में निर्दलीय के रूप में लड़ा था। फिर भाजपा में शामिल हो गए। मंत्री विजय शाह के भाई हैं। टिमरनी से भाजपा प्रत्याशी हैं।

आरिफ अकील : 1990 में आरिफ अकील भोपाल उत्‍तर
से जीते। इसके बाद ये सीट उनकी होकर रह गई। वे जनता दल होते हुए कांग्रेस में पहुंचे। भाजपा सीट पाने के लिए जद्दोजहद कर रही है। इस बार स्वास्थ्य कारणों से नहीं लड़ रहे, पुत्र आतिफ मैदान में हैं।

पुष्पराज सिंह : रीवा से 1998 में पुष्पराज निर्दलीय चुनाव जीते। कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे। पुत्र दिव्यराज भाजपा से विधायक हैं। हाल में पुष्पराज ने भी भाजपा ज्वाइन कर ली है।

पारस सखलेचा : 2013 के चुनाव में पारस भी निर्दलीय चुनाव जीत विधायक बने। इसके बाद कांग्रेस के साथ हो गए। व्यापमं मामले में व्हिसिल ब्‍लोअर बनकर उभरे। अभी कांग्रेस से प्रत्याशी।

सुदेश राय : सीहोर से भाजपा प्रत्याशी हैं। 2013 में पहली बार के निर्दलीय जीते। पहले कांग्रेस से जुड़ाव रहा, बाद में भाजपा में शामिल हो गए।

सुरेश सेठ : इंदौर के दिग्गज कांग्रेस नेता रहे सुरेश सेठ का राजनीतिक करियर निर्दलीय के तौर पर शुरू हुआ। 1985 में इंदौर-5 से निर्दलीय लड़े।

Updated on:
02 Nov 2023 07:53 am
Published on:
02 Nov 2023 07:44 am
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