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पदोन्नति में आरक्षण : ‘नागराज’ फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के सरकारी कर्मचारियों के पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित 2006 के 'नागराज' फैसले को बुधवार को बरकरार रखा।
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जयपुर

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Jameel Ahmed Khan

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Updated: 27 Sep 2018, 10:25 AM IST

Supreme Court of India

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के सरकारी कर्मचारियों के पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित 2006 के 'नागराज' फैसले को बुधवार को बरकरार रखा। कोर्ट ने इस फैसले में सीधे तौर पर पदोन्नति में आरक्षण को खारिज नहीं किया है, बल्कि इस मामले को राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने 'एम नागराज बनाम भारत सरकार' मामले में 12 साल पुराने फैसले की समीक्षा के लिए उसे सात-सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपने से इनकार कर दिया।

संविधान पीठ ने गत 30 अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने नागराज मामले से संबंधित फैसले की उस शर्त को अनुचित ठहराया, जिसके तहत एससी/एसटी समुदाय को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए पिछड़ेपन का आंकड़ा देना अनिवार्य किया गया था। कोर्ट ने कहा कि ये शर्त इंद्र साहनी मामले में नौ सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले के विपरीत है। संविधान पीठ ने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण के लिए प्रतिनिधित्व वाला विषय राज्य सरकारों पर छोड़ देना सही था, अर्थात् अब इस बारे में राज्य सरकारें तय करेंगी। पदोन्नति में आरक्षण किसे मिले, किसे नहीं, यह सरकार ही तय करे।

कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी कर्मचारियों को तरक्की में आरक्षण देने के लिए राज्य सरकारों को एससी/एसटी के पिछड़ेपन पर उनकी संख्या बताने वाला आंकड़ा इकट्ठा करने की कोई जरूरत नहीं। कोर्ट ने नागराज के फैसले में क्रीमी लेयर को सही ठहराते हुए कहा कि वह इसमें दखल नहीं देगा। उल्लेखनीय है कि क्रीमी लेयर पर नागराज के फैसले में कहा गया था कि पदोन्नति में आरक्षण देते समय समानता के सिद्धांत को लागू करते हुए क्रीमी लेयर, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व, 50 फीसदी आरक्षण की सीमा, प्रशासनिक क्षमता का ध्यान रखना होगा। साल 2006 में कोर्ट ने इस मामले में दिये अपने फैसले में एससी/एसटी कर्मियों को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए राज्य सरकारों के सामने कुछ शर्तें रखी थीं, जिसके बाद इस मुद्दे को सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजने की मांग को लेकर एक याचिका दाखिल की गई थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को फैसला दिया है।