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जैसा अभी अमेरिका ने किया है, वैसा ही कुछ 76 साल पहले नेपाल में कर चुका है भारत!

भारत ने 1950 में राजा त्रिभुवन को अपने काठमांडू दूतावास में शरण देकर नेपाल में जारी राणा शासन को खत्म किया। जानिए इसकी पूरी कहानी...

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Bharat

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Pushpankar Piyush

Jan 04, 2026

3 जनवरी, शनिवार को अमेरिकी डेल्टा फोर्सेज ने वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई की। अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठाकर अमेरिका ले आई। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ऐसी कार्रवाई की क्षमता किसी अन्य देश में नहीं है। उन्होंने अमेरिकी कार्रवाई को लेकर कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा पहली बार हुआ है, लेकिन इतिहास के पन्नों में ऐसा कारनामा भारत के नाम भी दर्ज है। हालांकि, इसमें नेपाल के राजा त्रिभुवन की सहमति थी।

राणा शासन का कठपुतली था शाह परिवार

दरअसल, भारत को आजाद हुए कुछ ही समय हुए थे। साल 1950 में भारत में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे, जबकि उस समय नेपाल के राजा थे त्रिभुवन शाह। शाह को महज 5 साल की उम्र में साल 1911 में ताज पर बैठा दिया गया था, लेकिन असल ताकत थी राणा परिवार के पास। राणा शासन की शुरुआत 1846 में जंग बहादुर राणा से हुई थी, जिन्होंने कोत पर्व के माध्यम से सत्ता हथिया ली और शाह राजवंश को नाममात्र का राजा बना दिया।

इतिहास में कुछ जगह इस बात का जिक्र भी है कि 20वीं सदी में नेपाल में निरंकुश शासन चलाने वाले राणा परिवार को ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थन भी हासिल था। क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान राणा परिवार ने गोरखा लड़ाकों को मित्र राष्ट्र (जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका) के समर्थन में लड़ने के लिए भेज दिया था।

नेहरू के सामने थी चुनौती

इधर, साल 1947 में भारत को ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आजादी मिली। देश के पहले प्रधानमंत्री बने पंडित जवाहर लाल नेहरू। अब नेहरू के सामने चुनौती थी कि वह नेपाल में किसका साथ दे। क्योंकि, नेपाल में निरंकुश राणा शासन के खिलाफ जनता की एक प्रजा परिषद भी आंदोलन कर रही थी। फरवरी 1950 में नेपाली प्रधानमंत्री मोहन राणा जब नेहरू से मिलने दिल्ली आए तो उन्हें इक्कीस तोपों को सलामी दी गयी। उनसे चीन में हुई माओ क्रांति के बाद नेपाल की स्थिति पर विमर्श हुआ।

फिर इसी साल 6 नवंबर 1950 को राजा त्रिभुवन अपने परिवार के साथ शिकार के बहाने निकले। उस दौरान उनके साथ उनके पुत्र महेंद्र और बड़े पोते वीरेंद्र थे, जबकि छोटे पोते ज्ञानेंद्र घर पर ही थे। तीनों ने काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास में शरण ले ली। राणा प्रधानमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा ने क्रोधित होकर 9 नवंबर को तीन वर्षीय ज्ञानेंद्र को राजा घोषित कर दिया।

भारत सरकार ने 10 नवंबर को ऐतिहासिक कदम उठाया। दो भारतीय विमानों ने राजा त्रिभुवन और उनके परिवार को नई दिल्ली एयरलिफ्ट कर लिया। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनका स्वागत किया और ज्ञानेंद्र को वैध राजा मानने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही, भारत सरकार ने नेपाल में राणा परिवार पर भारी कूटनीतिक दवाब डाला।

नेपाल में हुई जनक्रांति, फिर दिल्ली का समझौता

इससे नेपाल में जनक्रांति भड़क उठी। महिलाएं और युवा सड़कों पर उतरे। नेपाली कांग्रेस की मुक्ति सेना ने राणा सेना से संघर्ष किया। आखिरकार "दिल्ली समझौता" हुआ। 15 फरवरी 1951 को राजा त्रिभुवन परिवार सहित काठमांडू लौटे। हवाई अड्डे से दरबार तक लाखों लोग जश्न मनाते हुए सड़कों पर उमड़ पड़े। 18 फरवरी 1951 को नारायणहिटी दरबार में राजा त्रिभुवन की औपचारिक ताजपोशी हुई। राजा ने संवैधानिक राजतंत्र की घोषणा की।