5 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Exclusive : यहां रावण का नहीं होता दहन, मनायी जाती है तेरहवीं

अपनी विशिष्टताओं की वजह से जसवंतनगर की रामलीला 2010 में यूनेस्को की सूची में शामिल हो चुकी है...

3 min read
Google source verification
ramleela ke rang

Exclusive : यहां रावण का नहीं होता दहन, मनायी जाती है तेरहवीं

पत्रिका एक्सक्लूसिव
दिनेश शाक्य
इटावा. रामायण के विभिन्न पात्रों का रामलीलाओं में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरह से मंचन किया जाता है। दशहरा में उनके पूजन का तरीका भी भिन्न-भिन्न प्रकार का है। जसवंतनगर में रावण की न केवल पूजा की जाती है बल्कि पूरे शहर भर में रावण की आरती उतारी जाती है। यहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं होता। पुतले की लकड़ियों को लोग अपने घरों में साल भर रखते हैं। ताकि हर संकट से दूर रह सकें। दशहरे के बाद रावण की तेरहवीं मनायी जाती है।

यूनेस्को की रिपोर्ट में शामिल रामलीला
अपनी विशिष्टताओं की वजह से जसवंतनगर की रामलीला 2010 में यूनेस्को की सूची में शामिल हो चुकी है। दक्षिण भारतीय की तर्ज पर यहां की रामलीला खुले मैदान में होती है। त्रिडिनाड की शोधार्थी इंद्राणी बैनर्जी ने जसवंतनगर की रामलीला पर शोध किया है। उन्होंने लिखा है कि यहां की रामलीला में रावण की आरती उतारी जाती है। पूजा होती है। जानकार बताते हैं कि जसवंतनगर में रामलीला की शुरुआत 1855 में हुई थी। 1857 के ग़दर में यह नहीं हो सकी। इसके बाद से वर्ष 1859 से लगातार जारी है।

खुले मैदान में रामलीला
जसवंतनगर की रामलीला में रावण, मेघनाथ, कुम्भकरण ताम्बे, पीतल और लोहे की धातु से निर्मित मुखौटे पहन कर खुले मैदान में राम लीलाएं करते हैं। त्रिपुंड का टीका भी इनके चेहरे पर लगा होता है।

रावण की पूजा को हर कोई लालायित
रामलीला मैदान में रावण का लगभग 15 फुट ऊंचा रावण का पुतला नवरात्र की सप्तमी को लग जाता है। दशहरे को रावण अपनी सेना के साथ युद्ध करने को निकलता है तब उसकी धूप-कपूर से आरती होती है। दशहरा के दिन शाम को डोलो पर सवार होकर राम और रावण के बीच युद्ध होता है। रात दस बजे के आसपास पंचक मुहूर्त में रावण का प्रतीकात्मक वध होता हैं। पुतले की बांस की खप्पची, कपड़े और उसके अंदर के अन्य सामान नोच-नोच कर लोग घर ले जाते है। मान्यता है कि इसको घर में रखने से भूत-प्रेत का प्रकोप नहीं होता। विद्वता आती है और धन में बरक्कत होती है। बाद में रावण की तेरहवीं मनाई जाती है, जिसमें कस्बे के लोगों को आमंत्रित किया जाता है।

रामलीला में दक्षिण भारत का असर
रामलीला समिति के अध्यक्ष लाल शैलैंद्र प्रताप रईस का कहना है कि जसवंनगर की रामलीला में पात्रों को परंपरागत कपड़े और मुखौटों के अलावा पूरे शस्त्र दिए जाते हैं ताकि सजीवता बनी रहे। समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता बबलू कहते हैं कि पहले सिर्फ दिन में यहां की रामलीला होती थी। अब रात को भी होती है। यहां की रामलीला के आयोजकों के पूर्वज सौराष्ट्र के रहने वाले थे। आजादी से पहले वे यहां आकर बस गए। इसलिए रामलीला में दक्षिण भारत की छाप है।

पिता के बाद पुत्र निभा रहा रावण का किरदार
खास बात यह है कि यहां की रामलीला के मुख्य पात्र राम,लक्ष्मण,सीता और रावण केवल ब्राहम्ण जाति से ही ताल्लुक रखते हैं। 32 साल तक रावण का किरदार निभाने वाले विपिन बिहारी पाठक का बेटा धीरज पाठक पिता की मौत के बाद पिछले दस सालों रावण का किरदार निभा रहा है। वे कहते हैं रावण के पात्र का किरदार निभाना मन को काफी सुकून देता है।

तकनीक में अभी पीछे
जसवंतनगर की रामलीला अभी तकनीक में बहुत पीछे है। सोशल मीडिया के युग का भी प्रभाव यहां नहीं दिखता। फेसबुक, यूट्यूब आदि से रामलीला नहीं जुड़ी। 1915 से समिति की खुद की जमीन पर रामलीला होती है।