महाभारत काल में हुए महर्षि वेद व्यास के नाम से तो शायद ही कोई अनजान हो , ये वही मुनिश्रेष्ठ हैं जिन्होंने चारों वेदों का विभाग किया, अठारह पुराणों की रचना की और श्रीमद भागवत की रचना की, उन्हें गुरु – शिष्य परंपरा का प्रथम गुरु माना जाता है, वे भली भांति जानते थे कि यदि किसी व्यक्ति से कोई ज्ञान मिलता है, कुछ सीखने को मिलता है, तो वो हमारे लिए गुरु समान हैं, पूजनीय हैं, फिर चाहे वो कोई छोटा सा जीव - जंतु, कोई प्राणी या फिर मनुष्य ही क्यों न हो। शास्त्रों में एक घटना का वर्णन आता है कि एक बार मुनिवर ने भील जाति के एक व्यक्ति को पेड़ को झुकाकर उससे नारियल तोड़ते हुए देखा | उस दिन से व्यास जी उस व्यक्ति का पीछा करने लगे क्योंकि वो ये विद्या सीखने के इच्छुक थे, पर वो व्यक्ति संकोच और डर के कारण वेद व्यास जी से दूर भागता था | एक दिन पीछा करते – करते व्यास जी उस व्यक्ति के घर पंहुच गए जहाँ वो तो नहीं, पर उसका पुत्र मिल गया जिसने व्यास जी की पूरी बात सुनी और वो मंत्र देने को तैयार हो गया |