
पति की लम्बी उम्र के लिये सुहगिनें करती हैं वट वृक्ष की पूजा, जानिये इसका महत्व, क्या है इसके पीछे की कहानी
फर्रुखाबाद. अपने पति की लम्बी आयु के लिये सुहागिनें आज के दिन वट वृक्ष की पूजा अर्चना करती हैं। सुहागिनें पति की लम्बी उम्र और सुख शांति के लिए वट वृक्ष की पूजा की। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए फर्रुखाबाद की महिलाओं ने भी ये पूजा की। वट वृक्ष को आम, लीची सरीखे मौसमी फल अर्पित किये गये। कच्चे सूत से बांधने और बियेन (हथ पंखा) से ठंडक पहुंचाने के बाद महिलाओं ने आस्था के साथ इसकी परिक्रमा की। पूजा के बाद वट सावित्री कथा भी सुनी जाती है। ज्येष्ठ मास के आमावस्या के दिन पड़ने वाले इस पर्व मे सुहागिन महिलाओं ने पुजा की थाली सजाकर वट वृक्ष की बारह बार परिक्रमा करती हैं और फल फुल चढ़ाकर सुख समृद्धि और पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।
वट सावित्री व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त
अमावस्या तिथि प्रारंभ: 02 जून 2019 को शाम 04 बजकर 39 मिनट से
अमावस्या तिथि समाप्त: 03 जून 2019 को दोपहर 03 बजकर 31 मिनट तक
वट वृक्ष की पूजा विधि
- इस व्रत की पूजा के लिए विवाहित महिलाओं को बरगद के पेड़ के नीचे पूजा करनी होती है।
- सभी सुहागनें 16 शृंगार करके दुल्हन की तरह सज धज कर हाथों में प्रसाद लें।
- प्रसाद के रूप में थाली में गुड़, भीगे हुए चने, आटे से बनी हुई मिठाई, कुमकुम, रोली, मोली, 5 प्रकार के फल, पान का पत्ता, धुप, घी का दीया, एक लोटे में जल और एक हाथ का पंखा लेकर बरगद पेड़ के नीचे जाएं।
- फिर पेड़ की जड़ में पानी चढा कर प्रसाद चढ़ाएं और धूप तथा दीपका जलाएं।
- उसके बाद पूजा करते हुए भगवान से पति के लिए लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें।
- फिर सावित्री माँ से आशीर्वाद लें और पेड़ के चारो ओर कच्चे धागे से या मोली को 7 बार बांधे और प्रार्थना करें।
- फिर पति के पैर धो कर आशीर्वाद लें।
व्रत का महत्व
इस व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। कहते हैं कि इसी पेड़ के नीचे सावित्री ने अपने पति को यमराज से वापस पाया था। सावित्री को देवी का रूप माना जाता है। हिंदू पुराण में बरगद के पेड़े में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास बताया जाता है। यह माना जाता है कि ब्रह्मा जी वृक्ष की जड़ में, विष्णु इसके तने में और शिव उपरी भाग में रहते हैं। यही वजह है कि इस पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है।
व्रत की कथा
भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए कई वर्षों तक तपस्या कि जिससे प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने प्रकट होकर पुत्री का वरदान दे दिया। फलस्वरूप राजा को कन्या हुई और इसी वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या काफी सुंदर और गुणवान थी। सवित्री के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था जिसके लिए राजा दुखी थे। इस कारण राजा कि पुत्री खुद ही वर तलाशने तपोवन में भटकने लगी। वहां सावित्री ने राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को देखा और उन्हें पति के रूप में मानकर उनका वरण किया। सत्यवान अल्पआयु और वे वेद ज्ञाता भी थे। नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह करने के लिए समझाया। लेकिन सावित्री ने नारद मुनि की बात नहीं सुनी और सत्यवान से ही शादी कर ली। जब सत्यवान की मृत्यु में जब कुछ ही दिन बचे थे तब सावित्री ने घोर तपस्या की जिसके बाद यमराज ने सावित्री के तप से प्रसन्न हो गए और उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। वरदान में सावित्री ने अपने पति के प्राण मांग लिए।
Updated on:
03 Jun 2019 09:32 am
Published on:
03 Jun 2019 09:30 am
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