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फुलवा है देश में सबसे प्राचीन आलू की प्रजाति, सामान्य आलू से होती है दोगुनी कीमत

- 500 साल पहले पुर्तगाली लेकर आए थे भारत- दम आलू और पापड़ में होता है इस्तेमाल

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फर्रुखाबाद. आलू आज हमारे खाने का एक अहम हिस्सा बन गया। कई सब्जियां बिना आलू के अधूरी हैं। जब आलू के दाम आसमान छूते हैं तो पूरे भारत में हंगामा मच जाता है, लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि आज से 500 साल पहले पुर्तगालीन व्यापारियों द्वारा भारत लाया गया फुलवा आलू का कोई अस्तित्व ही नहीं था। लेकिन अब सब्जियों में फुलवा प्रजाति का आलू भी खूब देखने को मिलता है। जिले में पैदा होने वाला पांच सौ साल पुरानी आलू की प्रजाति 'फुलवा' आलू का जलवा अब देश भर में कायम है और साथ ही इसे दम आलू और होली के त्यौहार पर स्वादिष्ट पापड़ बनाने में बहुतायत में इस्तेमाल किया जाता है। इसीलिए सामान्य आलू की अपेक्षा इस आलू की कीमत दोगुनी होने के बाद भी स्वाद के शौकीन इस फुलवा प्रजाति के आलू को खरीदकर इस्तेमाल करते हैं। फुलवा आलू का उत्पादन करने वाले किसान प्रदेश के साथ ही दूसरे प्रांतों तक इसकी आपूर्ति करते हैं। प्रदेश के कुछ हिस्सों में कम उत्पादन और ज्यादा दिन में फसल होने के कारण कुछ ही किसानों द्वारा इसक आलू की पैदावार वर्तमान में की जा रही है।

दरअसल करीब 500 वर्ष पुरानी नॉन हाइब्रिड आलू की प्रजाति फुलवा की फसल 150 दिनों में तैयार होती है। कुछ बड़े किसान अपने इस्तेमाल के साथ ही बाजारों में भी यह आलू उपलब्ध करा रहे हैं। फुटकर बाजार में सामान्य आलू आठ से 10 रुपए प्रति किलो है, जबकि फुलवा की बिक्री उससे दोगुनी या फिर अधिक दामों में हो रही है। फुलवा प्रजाति की आलू के कंद में लज्जत अधिक होती है, जबकि शुगर की मात्रा कम पाई जाती है। इसलिए यह सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। इससे बनी दम आलू की सब्जी का स्वाद एकदम अलग और बेहतर होता है और इस आलू के पापड़ भी खाने में बेहतर और स्वादिष्ट लगते हैं।

पांच माह में तैयार होती है फुलवा आलू की फसल

जिले के किसानों का कहना है कि फुलवा प्रजाति के आलू का उत्पादन अन्य हाइब्रिड आलू की फसलों की अपेक्षा आधा यानी 20 से 25 पैकेट प्रति बीघा होता है। फुलवा आलू की फसल पांच माह में तैयार होती है। छोटा आलू निकलता है। शौकीन किसान अब भी खाने के लिए फुलवा आलू ही बोते हैं। घर की खपत के साथ मंडियों में भी भेजते हैं। ताकि इस आलू का स्वाद और अधिक लोगों तक पहुंचे और इस आलू की आपूर्ति के लिए नए किसान भी पैदावार करने के लिए प्रेरित हो सके। यह फुलवा आलू भूनकर खाने में और भी अधिक स्वादिष्ट लगता है।

भारत में 18वीं शताब्दी तक हो चुका प्रचार-प्रसार

आलू भले ही अब भारतवासियों का सबसे पसंदीदा हो गया हो लेकिन आलू का जन्म भारत में नहीं हुआ। दक्षिण अमेरिका की एंडीज पर्वत श्रृंखला में स्थित टिटिकाका झील के पास सबसे पहले फुलवा आलू की पैदावार की गई थी। भारत में फुलवा आलू को बढ़ावा देने का श्रेय वारेन हिस्टिंग्स को भी जाता है जो 1772 से 1785 तक भारत के गवर्नर जनरल रहे। 18वीं शताब्दी तक फुलवा आलू का पूरी तरह से भारत में प्रचार-प्रसार हो चुका था। लेकिन इससे पहले 17वीं शताब्दी के शुरू में पुर्तगाली व्यापारी फुलवा आलू भारत लेकर आए थे। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के आलू प्रजनन केंद्रों में अब तक 66 उन्नतशील किस्मों का विकास किया गया है।