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पौष पुत्रदा एकादशी व्रत, जानें व्रत के नियम और कथा

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत, जानें व्रत के नियम और कथा

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भोपाल

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Tanvi Sharma

Jan 03, 2020

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत, जानें व्रत के नियम और कथा

पौष महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन पुत्रदा एकादशी आती है। हालांकि पुत्रदा एकादशी साल में दो बार आती है। एकादशी का दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। साल 2020 में यह एकादशी 6 जनवरी को पड़ रही है। इस एकादशी में भगवान विष्णु के बाल रूप की पूजा की जाती है।

पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान प्राप्ति के लिये किया जाता है। इस एकादशी का पुण्यफल संतान के भाग्य और कर्म को उत्तम बनाने में सहायक माना गया है। जिस किसी भी दंपत्ति को संतान प्राप्ति करने में दिक्कत आती है उसको यह व्रत जरूर करना चाहिए। आइए जानते हैं पुत्रदा एकादशी व्रत के नियम और व्रत कथा...

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत मुहूर्त

7 जनवरी 2020 को पारणा मुहूर्त - 13:29:53 से 15:34:49 तक

7 जनवरी 2020 को हरि वासर समाप्त होने का समय :10:07:19 पर

पुत्रदा एकादशी व्रत के नियम

- व्रत रखने वाले को दशमी के दिन लहसुन, प्याज के भोजन करें।

- एकादशी के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु की पूजा करें।

- एकादशी के दिन दीपदान करना शुभ माना जाता है।

- जो व्यक्ति यह व्रत रखता है उसे एकादशी के दिन पूरे दिन निराहार रहना होता है।

- द्वादशी के दिन ब्राह्मण को भोजन करवाकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद स्वयं भोजन करें ऐसा नियम है।

- द्वादशी के दिन भी व्रती को सात्विक भोजन करना चाहिए।

- इन नियमों के अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से व्रत सफल होता है।

ये है पुत्रदा एकादशी की कथा

पहले किसी समय में भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। उनके यहां कोई संतान नहीं थी, इसलिए दोनों पति-पत्नी सदा चिन्ता और शोक में रहते थे। इसी शोक में एक दिन राजा राजा सुकेतुमान वन में चले गये। जब राजा को प्यास लगी तो वे एक सरोवर के निकट पहुंचे। वहां बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे थे। राजा ने उन सभी मुनियों को वंदना की।

प्रसन्न होकर मुनियों ने राजा से वरदान मांगने को कहा। मुनि बोले कि पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकदाशी कहते हैं। उस दिन व्रत रखने से योग्य संतान की प्राप्ति होती है। तुम भी वही व्रत करो। ऋषियों के कहने पर राजा ने पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। कुछ ही दिनों बाद रानी चम्पा ने गर्भधारण किया। उचित समय आने पर रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट किया तथा न्यायपूर्वक शासन किया।