Vaikuntha or Baikunth Chaturdashi 2020: इस दिन हरि से मिलेंगे हर, खुलेंगे बैकुंठ के द्वार

: वैकुंठ चतुर्दशी 2020 में कब है (Vaikuntha Chaturdashi 2020 Mein Kab Hai)
: वैकुंठ चतुर्दशी 2020 का दिन व समय Vaikuntha Chaturdashi 2020 Date And Time
: वैकुंठ चतुर्दशी का शुभ मुहूर्त (Vaikuntha Chaturdashi Shubh Muhurat)
: वैकुंठ चतुर्दशी का महत्व (Vaikuntha Chaturdashi Importance)
: वैकुंठ चतुर्दशी की पूजा विधि (Vaikuntha Chaturdashi Puja Vidhi)
: वैकुंठ चतुर्दशी की कथा (Vaikuntha Chaturdashi Story)

By: दीपेश तिवारी

Published: 24 Nov 2020, 12:52 PM IST

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को वैकुंठ / बैकुंठ चतुर्दशी Vaikuntha Chaturdashi या बैकुंठ चौदस baikuntha Chaturdas होती है। देवउठनी एकादशी के बाद जब भगवान विष्णु जाग्रत अवस्था में आते हैं। उसके बाद से ही वह भगवान शिव की आराधना में लीन हो जाते हैं। वहीं इस दिन भगवान विष्णु के साथ भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस वर्ष बैकुंठ चतुर्दशी 28 नवंबर 2020 को आ रही है।

इस दिन भगवान शिव सृष्टि का कार्यभार भगवान विष्णु को सौंपने के लिए उनसे भेंट करते हैं। इसलिए इस दिन को हरिहर मिलन के नाम से भी जाना जाता है। साल में यही एकमात्र दिन होता है जब शिव को तुलसी और विष्णु को बिल्वपत्र अर्पित किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के परमधाम बैकुंठ के दरवाजे सभी प्राणियों के लिए खुले रहते हैं इसलिए इसे बैकुंठ चौदस कहा गया है। अर्थात् इस दिन यदि किसी प्राणी की मृत्यु होती है तो वह सीधे बैकुंठ में प्रवेश करता है।

कथा के अनुसार एक बार भगवान विष्णु शिव जी का दर्शन करने महादेव की नगरी काशी में आए। उसके बाद उन्होंने मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने के पश्चात एक हजार स्वर्ण कमलों से शिव जी का पूजन करने का संकल्प लिया। विष्णु जी की परीक्षा लेने के उद्देश्य से शिव जी ने उन स्वर्ण कमलों में से एक कमल कम कर दिया। तब उस कमल की पूर्ति करने के लिए विष्णु जी ने अपने नयन कमल शिव जी को अर्पित करने का विचार किया। जैसे ही विष्णु जी अपने नयन अर्पित करने को तत्पर हुए, शिव जी प्रकट हो गए। उन्होंने विष्णु जी से कहा कि आपके समान मेरा कोई भक्त नहीं है। तब शिव जी ने कहा की आज से कार्तिक मास की चतुर्दशी वैकुंठ चतुर्दशी के नाम से जानी जाएगी। विष्णु जी की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया।

Vaikunth chaturdashi 2020 shubh muhurat date and importance

बैकुंठ चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु को पीतांबर, मुकुट आदि पहनाकर उनका सुंदर श्रृंगार किया जाता है। धूप-दीप, चंदन तथा पुष्प अर्पित किए जाते हैं। इस दिन श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णुसहस्त्रनाम और श्री सूक्त का पाठ करने से समस्त प्रकार के भोग प्राप्त होते हैं। इस दिन भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करके चंदन, अष्टगंध का लेप किया जाता है। बेल, धतूरे, आंक के फूलों से श्रृंगार मिठाई का नैवेद्य लगाया जाता है।

बैकुंठ चौदस का महत्व importance of baikunth chaturdas
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार मनुष्यों के लिए भगवान विष्णु से मुक्ति का मार्ग पूछने के लिए नारद जी उनके समीप पहुंचते हैं। नारद जी के पूछने पर विष्णु जी कहते हैं कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो प्राणी श्रद्धा-भक्ति से मेरी और शिव की पूजा करते हैं, उनके लिए बैकुंठ के द्वार खुल जाते हैं। बैकुंठ चतुर्दशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का पालन करें। 108 कमल पुष्पों से भगवान श्री हरि विष्णु का पूजन कर शिव की पूजा अर्चना करें। चतुर्दशी के दिन सायंकाल में किसी स्वच्छ नदी या तालाब में 14 दीपक लगाकर जल में प्रवाहित करें।

शिव ने दिया था सुदर्शन चक्र Sudarshan Chakra
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार एक बार विष्णु जी काशी में भगवान शिव की आराधना करते हुए उन्हें एक हजार स्वर्ण कमल चढ़ाने का संकल्प करते हैं। जब अनुष्ठान का समय आता है, तो शिव परीक्षा लेने के लिए एक स्वर्ण पुष्प कम कर देते हैं। एक पुष्प कम होने पर विष्णु जी अपनी एक आंख निकालकर शिवजी को अर्पित करते हैं। भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न् होकर उन्हें कमल नयन और पुंडरीकाक्ष नाम देते हैं और भगवान विष्णु को कोटि सूर्यों की कांति के समान सुदर्शन चक्र प्रदान करते हैं।

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होता है हरिहर मिलन
पुराणोक्त मान्यता के अनुसार चार माह देवशयनी एकादशी से लेकर देव प्रबोधिनी एकादशी तक भगवान विष्णु धरती का कार्यभार शिव को सौंपकर योग निद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान भगवान शिव ही धरती और धरतीवासियों को संभालते हैं। इसके बाद देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं और बैकुंठ चतुर्दशी के दिन शिव यह कार्यभार पुन: विष्णुजी को सौंप देते हैं। इस अवसर पर उज्जैन सहित अनेक धार्मिक नगरी में हरिहर मिलन करवाया जाता है। उज्जैन में भगवान महाकाल की सवारी धूमधाम से निकालकर गोपाल मंदिर ले जाई जाती है। यहां पर दोनों एक-दूसरे की प्रिय वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं। वर्ष का यह एकमात्र दिन होता है जब महाकाल को चढ़ने वाले आंकड़े के फूल और माला विष्णु अवतार गोपाल जी को अर्पित की जाती है, वहीं महाकाल को भी विष्णु भगवान की प्रिय तुलसी अर्पित की जाती है।

बैकुंठ चतुर्दशी 2020 : Shubh Muhurat
: निशिथकाल मध्यरात्रि 11.42 से 12.37 बजे तक
: अवधि 55 मिनट
: चतुर्दशी तिथि प्रारंभ- 28 नवंबर को प्रात: 10.21 बजे से
: चतुर्दशी तिथि पूर्ण- 29 नवंबर को दोपहर 12.47 बजे तक

व्रत का विधान- vrath vidhi
वैकुंठ चतुर्दशी को प्रातःकाल स्नानदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान के समक्ष व्रत का संकल्प करें और पूरे दिन व्रत करें। रात्रि के समय कमल के पुष्पों से भगवान विष्णु की पूजन करें। तत्पश्चात भगवान शिव का विधि-विधान के साथ पूजन करें। दूसरे दिन प्रातः उठकर शिव जी का पूजन करके जरुरतमंदो को भोजन करवाएं और व्रत का पारण करें।

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बैकुंठ चतुर्दशी की प्रमुख पौराणिक कथाएं : Vaikuntha Chaturdashi Katha In Hindi

बैकुंठ चतुर्दशी की पुराणों में मुख्य रूप से ये 3 कथाएं मिलती हैं , जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें वैकुंठ चतुर्दशी के दिन पढ़ने से 14000 पाप कर्मों का दोष मिट जाता है।

कथा- 1
वैकुंठ चतुर्दशी की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार की बात है नारद जी पृथ्वी लोक से घूम कर बैकुंठ धाम पंहुचते हैं। भगवान विष्णु उन्हें आदरपूर्वक बिठाते हैं और प्रसन्न होकर उनके आने का कारण पूछते हैं।

नारद जी कहते है- हे प्रभु! आपने अपना नाम कृपानिधान रखा है। इससे आपके जो प्रिय भक्त हैं वही तर पाते हैं। जो सामान्य नर-नारी है, वह वंचित रह जाते हैं। इसलिए आप मुझे कोई ऐसा सरल मार्ग बताएं, जिससे सामान्य भक्त भी आपकी भक्ति कर मुक्ति पा सकें।
यह सुनकर विष्णु जी बोले- हे नारद! मेरी बात सुनो, कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नर-नारी व्रत का पालन करेंगे और श्रद्धा-भक्ति से मेरी पूजा-अर्चना करेंगे, उनके लिए स्वर्ग के द्वार साक्षात खुले होंगे।

इसके बाद विष्णु जी जय-विजय को बुलाते हैं और उन्हें कार्तिक चतुर्दशी को स्वर्ग के द्वार खुला रखने का आदेश देते हैं। भगवान विष्णु कहते हैं कि इस दिन जो भी भक्त मेरा थोडा़-सा भी नाम लेकर पूजन करेगा, वह बैकुंठ धाम को प्राप्त करेगा।


कथा- 2
पौराणिक मतानुसार एक बार भगवान विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आए। वहां मणिकर्णिका घाट पर स्नान करके उन्होंने 1000 (एक हजार) स्वर्ण कमल पुष्पों से भगवान विश्वनाथ के पूजन का संकल्प किया। अभिषेक के बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक कमल पुष्प कम कर दिया।
भगवान श्रीहरि को पूजन की पूर्ति के लिए 1000 कमल पुष्प चढ़ाने थे। एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा मेरी आंखें भी तो कमल के ही समान हैं। मुझे 'कमल नयन' और 'पुंडरीकाक्ष' कहा जाता है। यह विचार कर भगवान विष्णु अपनी कमल समान आंख चढ़ाने को प्रस्तुत हुए।

baikunth chaturdashi 2020 : Harihar Milan Date and time, katha and whats special in 2020

विष्णु जी की इस अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव प्रकट होकर बोले- 'हे विष्णु! तुम्हारे समान संसार में दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है। आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब 'बैकुंठ चतुर्दशी' कहलाएगी और इस दिन व्रतपूर्वक जो पहले आपका पूजन करेगा, उसे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी।
भगवान शिव ने इसी बैकुंठ चतुर्दशी को करोड़ों सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र, विष्णु जी को प्रदान किया। शिवजी तथा विष्णुजी कहते हैं कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहेंगें। मृत्युलोक में रहना वाला कोई भी व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह अपना स्थान बैकुंठ धाम में सुनिश्चित करेगा।

कथा 3
धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण था जो बहुत बुरे काम करता था, उसके ऊपर कई पाप थे। एक दिन वो गोदावरी नदी में स्नान के लिए गया, उस दिन वैकुंठ चतुर्दशी थी। कई भक्तजन उस दिन पूजा अर्चना कर गोदावरी घाट पर आए थे, उस भीड़ में धनेश्वर भी उन सभी के साथ था। इस प्रकार उन श्रद्धालु के स्पर्श के कारण धनेश्वर को भी पुण्य मिला। जब उसकी मृत्यु हो गई तब उसे यमराज लेकर गए और नरक में भेज दिया।

तब भगवान विष्णु ने कहा यह बहुत पापी हैं पर इसने वैकुंठ चतुर्दशी के दिन गोदावरी स्नान किया और श्रद्धालुओं के पुण्य के कारण इसके सभी पाप नष्ट हो गए इसलिए इसे वैकुंठ धाम मिलेगा। अत: धनेश्वर को वैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई।

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दीपेश तिवारी
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