
कांच कारखानों से निकलकर सड़कों पर आ गया बाल श्रमिक, ये है वजह
फिरोजाबाद। हाईकोर्ट की रोक के बाद भी बाल श्रम नहीं रूक पा रहा है। इसके पीछे कई वजह हैं। फिरोजाबाद के अंदर काफी संख्या में मजदूर वर्ग निवास करता है। इन मजदूर वर्ग का परिवार रोजी रोटी चलाने के लिए होटलों, ढाबों, दुकानों और फेरी लगाकर पेट पालने को विवश है। पत्रिका ने बाल श्रम को लेकर मजदूरी और फेरी लगाने वाले बाल श्रमिकों से बात की तो उनकी सुनकर हर किसी की आंखों से आंसू निकल पड़ेंगे।
पानी से जलता है घर का चूल्हा
गांव मोहम्मदाबाद निवासी 10 वर्षीय मोमीन बताता है कि उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है। मां अकेली घर पर रहती है एक छोटा भाई है। पिता मजदूरी करके परिवार का पालन पोषण करते थे लेकिन उनकी मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाला कोई नहीं था। मां का रो-रोकर बुरा हाल होता था। तब उसने थक हारकर पानी बेचने का मन बना लिया। करीब तीन साल से वह पानी बेचकर परिवार का पालन पोषण कर रहा है।
पिता है अपाहिज, कौन उठाएगा भार
गांव छितरई निवासी राजेश बताता है कि उसके पिता अपाहिज हैं। चलने फिरने में असमर्थ हैं। ऐसी स्थिति में घर का भार कौन उठाएगा। मां आलू के सीजन में आलू बीनने जाती है और मैं टूंडला के अंदर कुल्फी बेचने का काम करता हूं। कक्षा दो तक की पढ़ाई करने के बाद परिवार की वजह से मैंने स्कूल जाना बंद कर दिया। अब परिवार का पालन पोषण करने के लिए कुल्फी बेचकर घर खर्च चल रहा हूं।
स्कूल भेज देंगे तो कैसे चलेगा घर खर्च
गांव बसई निवासी रामप्रसाद कहते हैं कि मेरी तबियत खराब रहती है। मैं काम करने में असमर्थ हूं। मैं भी चाहता हूं कि बेटे को पढ़ा, लिखा कर अच्छा व्यक्ति बनाऊं लेकिन मजबूरी ऐसी है कि बेटा ही होटल पर काम करके परिवार का घर खर्च चला रहा है। ऐसे में उसे स्कूल भेज दूंगा तो घर खर्च कौन उठाएगा।
Published on:
12 Jun 2018 03:07 pm
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