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गयाधाम की कई प्रमुख पिंडवेदियां हुई लुप्त, 365 में से 54 ही बची

करीब चालीस वर्ष पूर्व तक कई वेदियों पर पिंडदान होते थे। पर समय के साथ अतिक्रमण होने और अन्य कारणों से ऐसी कई वेदियां अब लुप्त हो चुकी हैं...

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गया

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Prateek Saini

Sep 28, 2018

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प्रियरंजन भारती की रिपोर्ट...

(गयाधाम): पांच कोस में फैले गया तीर्थ की महत्ता सभी तीर्थों में इसलिए प्रधान मानी गई है, क्योंकि इस भूभाग पर पंचकोटि देवी देवताओं का वास गया सुर के हृदयस्थल पर हुए विष्णुयज्ञ के काल से ही रहा है। वैदिक काल में कीकट प्रदेश के घने जंगलों में गयासुर का साम्राज्य था और विष्णुयज्ञ के दौरान सभी देवी देवताओं का आगमन यहां हुआ। इन सभी ने जहां जहां स्थान पाया वहीं कालांतर में पिंडवेदियां बनाई। इसका क्षेत्रफल झारखंड के हजारीबाग की कौलेश्वरी देवी मंदिर, पुनपुन, बराबर की गुफाओं और बोधगया तक फैला था। प्राचीन काल में पंचकोस मे पिंडदान की 365 वेदियां थीं जो समय के साथ विलुप्त होती चली गईं। अब मात्र 54 ही शेष बची हैं। इनमें से 45 पर पिंडदान और नौ पर तर्पण होते हैं।

पितृपक्ष में पहले होते थे पिंडदान,अब लुप्त हुई वेदियां-

करीब चालीस वर्ष पूर्व तक कई वेदियों पर पिंडदान होते थे। पर समय के साथ अतिक्रमण होने और अन्य कारणों से ऐसी कई वेदियां अब लुप्त हो चुकी हैं। लुप्त हो चुकी वेदियों के नाम हैं-कपिलधारा, ब्रम्हयोनि,तारक ब्रम्ह,सावित्री कुंड,सरस्वती सरोवर,गदालोल तालाब, घृतकुलपा,मधु कुलपा,पुण्डरीकाक्ष आदि। इन स्थानों पर अब अतिक्रमण है। तालाब समतल हो गएं और वेदियां लुप्त हो गईं।

वर्तमान में प्रमुख वेदियां

पितृपक्ष या अन्य दिनों में भी गयाधाम की मौजूदा जिन वेदियों पर पिंडदान की प्रमुखता है उनमें विष्णुपद मंदिर,फल्गु नदी और अक्षयवट प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त जिह्वालोल,विष्णुचरण,मंदिर परिसर की सोलह वेदी,प्रेतशिला, ब्रम्हकुंड,रामशिला,रामकुंड,सीताकुंड, काकबलि,उत्तर मानस,गयादित्य,उदीची, कनखल,सूर्यकुंड,गदाधर वेदी,गयाशीर्ष, गयाकूप,मुंडपृष्ठ,धौतपद,आदिगया,गोदावरी सरोवर,मंगला गौरी, वैतरणी सरोवर,ब्रम्ह सरोवर,भीमपिंडा,धर्मारण्य,बोधिवृक्ष,अक्षयवट आदि प्रमुख हैं । इन सबके अतिरिक्त प्रथम पिंडदान पुनपुन नदी घाट पर किया जाता है । गयाश्राद्ध के दौरान बराबर पहाड़ियों पर स्थित सिद्धनाथ मंदिर परिसर में भी पिंडदान किया जाता रहा है। पितृपक्ष के दौरान दूर दराज से आए यात्री विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी और अक्षयवट में पिंडदान कर वापस भी लौट जाते हैं।