गाजियाबाद में शहरी और ग्रामीण इलाकों में प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद होने वाली शिशुओं की मृत्यु दर में बढ़ोतरी रुक नहीं रही है। जानकारी के अनुसार बीते पांच साल में शून्य से एक वर्ष तक के 295 शिशुओं की मृत्यु हुई है। गाजियाबाद, जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसव के दौरान अथवा बाद में शिशु मृत्यु दर में तेजी से इजाफा हो रहा है। यहीं नहीं, ठीक से पालन-पोषण न होने की वजह से एक से चार साल के बच्चों की मृत्यु दर भी बढ़ रही है।
गाजियाबाद, जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसव के दौरान अथवा बाद में शिशु मृत्यु दर में तेजी से इजाफा हो रहा है। यहीं नहीं, ठीक से पालन-पोषण न होने की वजह से एक से चार साल के बच्चों की मृत्यु दर भी बढ़ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार विगत पांच साल में शून्य से एक वर्ष तक के 295 शिशुओं की मृत्यु हुई है। अधिकांश नवजातों की मौत प्रसव के दौरान अथवा बाद में हुई है। कुछ मामलों में जच्चा-बच्चा की भी मौत हुई हैं। वर्ष 2022 में सबसे अधिक 101 शिशुओं की मृत्यु दर्ज हुई है। इसके अलावा एक से चार साल के 202 बच्चों की मृत्यु भी दर्ज हुई है। अप्रैल 2022 से जनवरी 2023 के बीच प्रसव के दौरान 28 महिलाओं की मौत हुई है। इनका आडिट कराया जा रहा है। यह स्थिति तब है जबकि स्वास्थ्य विभाग की ओर से जच्चा-बच्चा की सुरक्षा को लेकर अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। हर महीने की नौ तारीख को गर्भवती महिलाओं की जांच को पीएचसी, सीएचसी और जिला अस्पतालों में विशेष शिविर आयोजित किये जाते हैं।
टीकाकरण न होने से बढ़ जाती हैं परेशानी
इस बारे में जानकारी देते हुए बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्चना सिंह ने कहा-रहन-सहन, समय पर सेहत की जांच न कराने और नियमित टीकाकरण न कराने पर प्रसव के दौरान मां-शिशु की मृत्यु की आशंका बढ़ जाती है। खून की कमी के चलते अधिकांश प्रसव क्रिटीकल स्थिति में कराये जाते हैं। नौ माह से पहले पैदा होने वाले नवजात की मौत अधिक सामने आ रही हैं। गर्भवती महिलाओं को सावधानी बरतनी चाहिए। खान-पान और नियमित उपचार कराना चाहिए। प्रसव के बाद अधिक देखभाल करनी चाहिए।
शिशुओं की देखभाल के लिए तैनात हैं आशा
सीएमओ डॉ. भवतोष शंखधर ने कहा कि प्रसव के दौरान और बाद में मां-शिशु के स्वास्थ्य की देखभाल को आशा कार्यकर्ता तैनात हैं। सेहत की जांच कराने पर कोई परेशानी सामने आती है तो नजदीकी सरकारी अस्पताल में दोनों को भर्ती कराया जाता है। संस्थागत प्रसव होने पर जच्चा-बच्चा स्वस्थ रहते हैं। घर पर अप्रशिक्षित दाई से प्रसव कराने और अपंजीकृत नर्सिंग होम में प्रसव कराने पर मां-बच्चे की जान को खतरा रहता है।